राहुल सांकृत्यायन और बिहार से उनका नाता

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पटना – उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गाँव में 9 अप्रैल 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन का आज 125 वां जन्मदिन है. उनके बचपन का नाम केदारनाथ पांडेय था. उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही एक मदरसे में हुई. उनकी बाल-विवाह हुई थी. लेकिन वे किशोरावस्था में घर छोड़कर चले गए और एक मठ में साधु बन गए. 1937 में उन्होंने रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में संस्कृत अध्यापक की नौकरी की. उस दौरान उनकी दूसरी शादी हुई.

उनकी रुचि बौध धर्म में थी. श्रीलंका में उन्होंने बौध धर्म पर शोध भी किया और तबसे वे राहुल हो गए. वे एक ज्ञानी व्यक्ति थे. उनके ज्ञान भंडार के कारण काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि भी दी. उन्होंने हिंदी के साथ धर्म, दर्शन, लोक साहित्य, यात्रा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, जीवनी, प्राचीन ग्रंथों का संपादन कर अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया.

उन्होंने हिंदी, संस्कृत, पालि, भोजपुरी, तमिल, कन्नड़, उर्दू, अरबी, तिब्बती, फ्रेंच, रुसी आदि भाषाओं में कई किताबें लिखीं. उनकी लिखी किताबों की संख्या लगभग 148 बताया जाता है. कुछ पुस्तकें तो प्रकाशित भी नहीं हो पाई. वर्ष 1958 में उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा गया. उनकी सृजन क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1963 में पद्मभूषण पुरस्कार मिला.

उनकी प्रमुख कृतियाँ – सतमी के बच्चे, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी, कनैल की कथा है.

उनके द्वारा लिखी गयी उपन्यास – बाईसवी सदी, भागो नहीं दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, जीने के लिए.

उनकी लिखी जीवनी – बचपन की स्मृतियाँ, अतीत से वर्तमान, कार्ल मार्क्स, घुमक्कड़ स्वामी, सरदार पृथ्वी सिंह, मेरे असहयोग के साथी, महामानव बुद्ध और कप्तान लाल

यात्रा साहित्य – मेरी लद्दाख यात्रा, किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, रूस में पच्चीस साल

राहुल सांकृत्यायन का बिहार से गहरा नाता था. उन्हें बिहार के अंग क्षेत्र से गहरा लगाव था. देश की पहली रंगीन हिंदी पत्रिका गंगा के संपादन के सिलसिले में उन्होंने भागलपुर के सुल्तानगंज में लंबा समय गुजारा था. उस क्रम में उन्हें भागलपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की. बिहार में सारण में असहयोग आन्दोलन में वे सक्रिय थे. वे गिरफ्तार भी हुए और छह माह जेल जेल में रहे. इसके बाद कांग्रेस के जिला सचिव बने और कांग्रेस के गया अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिए.

देशों के भ्रमण के बाद वे पटना आए. उन्होंने तिब्बत से लाई हुई चीज़ें पटना संग्रहालय और रिसर्च सोसाइटी को दान दिया. किसानों कि हालत जानने के लिए छपरा और डिहरी-ऑन-सोन की यात्राएं कीं. बिहार के किसान आन्दोलन में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई.