लालू प्रसाद ही एक मात्र ऐसे छात्र नेता हुए जो दो-दो बार छात्र संघ का प्रतिनिधित्व किये : चितरंजन गगन

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पटना- राजद के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व छात्र नेता चितरंजन गगन ने कहा है कि एक मात्र लालू प्रसाद ही ऐसे छात्र नेता थे जो दो-दो बार पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हुए। गगन ने कहा कि बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय में एक भी ऐसा छात्र नेता नहीं हुआ जो विश्वविद्यालय छात्र संघ के दो-दो महत्वपूर्ण पदों पर जीता हो। लालू प्रसाद ही एक मात्र ऐसे छात्र नेता थे जो 1970 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव चुने गये और 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने। जब पहले पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव पूर्ण रूप से जातिये गोलबंदी के आधार पर हुआ करता था और पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ पर पूर्ण रूप से सवर्णों का कब्जा होता था। तो 1970 में लालू प्रसाद ने ही जातिये गोलबंदी को तोड़कर महासचिव पद पर जीत हासिल की। 1973 में भी पहली बार विद्यार्थी परिषद को कामयाबी भी लालू के समर्थन और सहयोग के कारण ही मिला और सुशील मोदी पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव चुने गये। लालू का ही योगदान था कि पहली बार पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलकर भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर आन्दोलन शुरू किया और 18 मार्च, 1974 को उक्त मुद्दों पर बिहार विधान सभा का घेराव किया गया।

जे0पी0 आन्दोलन का प्रतिफल था कि 1977 में हुए पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में विद्यार्थी परिषद को कामयाबी मिली और अश्विनी कुमार चौबे छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। हालांकि वामपंथी छात्र संगठनों ने जबरदस्त टक्कर देने का काम किया था। लेकिन 1980 में हुए पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में विद्यार्थी परिषद और जनता विद्यार्थी मोर्चो (भाजपा का छात्र संगठन) का सुफड़ा साफ हो गया। अध्यक्ष पद पर अनिल कुमार शर्मा, उपाध्यक्ष पद पर रंधीर कुमार सिंह और महासचिव पद पर स्व0 प्रेमचंद सिन्हा की जीत हुई जो सभी निर्दलीय चुनाव लड़े थे। कुछ पदों पर कामयाबी के साथ एन एस यू आई (कांग्रेस का छात्र संगठन) अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हुई थी। सही अर्थों में 1980 के बाद विश्वविद्यालय में वैचारिक राजनीति की शुरूआत हुई और छात्र वैचारिक राजनीति में अभिरूची लेने लगें। और इसी का प्रभाव था कि बिहार में जब प्रेस विधयक लागू किया गया तो केवल नारों पर विचार करने के लिए पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ कार्यालय में छात्र संगठनों की हुई मैराथन बैठक 36 घंटों तक लगातार चली। जैसे-जैसे विश्वविद्यालय में वैचारिक राजनीति मजबूत होती गई वैसे-वैसे विद्यार्थी परिषद जैसे संगठन विश्वविद्यालय परिसर से बाहर होते गये।