वट सावित्री की पूजा

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हर महिला की तमन्ना होती है कि उसका पति स्वस्थ, दीर्घायु और बलवान हो। इसी तमन्ना को पूरा करने के लिए महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं। बिहार के विभिन्न जगहों पर महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं और अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस अवसर पर महिलाएं उपवास रखती हैं और पूजा करती है। इस पूजा को महिलाएं सावित्री और सत्यावान से जोड़कर देखती हैं।

लोगों की मान्यता है कि ज्येष्ठ माह की अमावस्या को यह मनाया जाता है। इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। रोली मोली, चावल, गुड़, भीगा हुआ चना, फूल, सूत, जल मिलाकर बड़ पर लपेटते हैं। और इसके बाद चारों ओर परिक्रमा लगाया जाता है। महिलाएं पूजा के बाद बड़ पेड़ के पत्तों से गहने बनाकर पहनती हैं या बाल में उसे लगाती हैं। फिर कहानी कही व सुनी जाती है।

शास्त्रों के मुताबिक वट सावित्री की पूजा करने से पति की आयु बढ़ती है और साथ ही वह जीवन भर किसी गंभीर बिमारी की चपेट में नहीं आता है।

महिलाएं इस पूजा के लिए विशेष तैयारी करती है। इस पूजन के दौरान महिलाएं सिंदुर यानी सिनोरा साथ रखती हैं। कहा जाता है कि सिनोरा हर महिला को शादी के बाद पुरोहित द्वारा दिया जाता है जिसे जिंदगी भर महिलाएं संभाल के रखती है। हिन्दू धर्म का प्रमुख पर्व वट सावित्री सुहाग की रक्षा और संतान की प्राप्ति के लिए यह पर्व आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। महिलाएं फल व नए वस्त्र की जमकर खरीदारी करती हैं। इसके अलावा पूजा सामग्री शृंगार सामग्रियों की दुकान पर अधिक भीड़ देखी जाती है। वट सावित्री पूजा में 21 प्रकार के फलों का प्रयोग होता है। इसमें मौसमी फल के अलावा cजिरोंजी खजूर, मखाना, बादाम आदि का प्रसाद बनाया जाता है।