वाचस्पति मिश्र

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मिथिलांचल के महान पंडित वाचस्पति मिश्र। आचार्य शंकर के तत्काल परवर्ती युग में वह उत्पन्न हुए थे और कहा जाता है कि उन्होंने न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत, इन छह आस्तिक एवं बौद्ध, जैन, चार्वाक आदि छह नास्तिक दर्शनों की टीका की थी और जब जिस ग्रंथ पर टीका लिखी, तब उसकी विषय-विस्तु, स्थापना एवं शैली के साथ ऐसा तादात्मय साधित किया था, कि मानो वह उसी के हो कर उसी मत-संप्रदाय के निमित्त वह टीका या व्याख्या लिखी हो। उनके स्वयं का मतवाद या चिंतन-बिंदु क्या था, यह सर्वथा अविज्ञात रह जाता, यदि ब्रह्मसूत्र की व्याख्या प्रकाश में नहीं आती। इसी में वह कुछ खुलते-से दिखाई पड़ते हैं अपने मनोभावों के प्रति। और इस संदर्भ में बड़े विश्वास के साथ यह कहा जाता है कि स्वयं शंकराचार्य अपनी ब्रह्मसूत्र की टीका लेकर आए और किसी प्रकार वाग्जाल में उलझा कर उन्हें इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य पर अपनी टीका प्रस्तुत करेंगे। क्योंकि ब्रह्मसूत्र पर अपना भाष्य लिख लेने के पश्चात स्वामी शंकर को यह आभास हुआ कि यदि मेरे भाष्य को वाचस्पति जैसे प्रकांड एवं सर्वतंत्र-स्वतंत्र विद्वान की पुष्टि नहीं प्राप्त होती है, तो वह यों ही सड़ जाएगा। पंडितों में उसकी मान्यता नहीं होगी। और फिर तो उस समय मिथिलांचल के पांडित्य की धाक सारे भारतवर्ष में थी और एक वाचस्पति मिश्र को अनुकूल बना लेने से ही सारे भारत के मनीषियों की नाक पकड़ में आ जा सकती है।

महाकवि आरसी प्रसाद सिंह