विक्रमशिला की मूर्तिकला से रूबरू होंगे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

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भागलपुर: देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को विक्रमशिला भ्रमण के दौरान विक्रमशिला की मूर्तिकला से अवगत कराया जाएगा। यहां खुदाई के दौरान सैकड़ों अवशेष मिले थे। प्राप्त मूर्तियों की कलात्मकता अनूठी व निराली है, जो सहज ही लोगों को आकर्षित कर लेती है।

आठवीं शताब्दी में पाल वंश के राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय सिर्फ शिक्षा के लिये ही नहीं, अपितु कला की समृद्धि के लिये भी प्रसिद्ध था। अवशेषों से यह परिलक्षित हो गया है कि विक्रमशिला में मूर्तिकला का अनूठा स्वरूप था। वहां की मूर्ति कला दो भागों में बंटी थी। टेराकोटा आर्ट यानी मृण मूर्ति कला और स्टोन आर्ट यानी पत्थर मूर्ति कला।

खुदाई में टेराकोटा की बनीं मूर्तियां बहुतायत में मिली थीं। टेराकोटा आर्ट दो भागों में विभक्त है, टेराकोटा प्लेट और टेराकोटा मूर्तियां। खुदाई में मिले मुख्य स्तूप में टेराकोटा आर्ट की बहुलता रही थी। दो तल वाले केंद्रीय चैत्य में चार चैम्बर तथा स्तूप परिसर में दो प्रदक्षिणा पथ हैं। इन चारों चैम्बरों में बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां खुदाई में जीर्ण-शीर्ण हालत में पाई गई थी। बौद्ध कालीन अनोखे समकोण चतुर्भुजाकार स्तूप के चारों ओर कमरे की बनावट तथा चैम्बरों से प्राप्त मूर्तियां मध्य एशिया में अबतक के प्राप्त पुरातत्व की सामग्रियों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।

पटना विवि के प्राचीन इतिहास विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ. बीपी सिन्हा ने स्तूप के मुख्य चैम्बर में मिली मूर्ति को पुरातात्विक दृष्टिकोण से मध्य एशिया की सबसे बड़ी मूर्ति बताई थी। स्तूप के चारों ओर 18/12 इंच आकार के टेराकोटा प्लेट में 400 से अधिक उत्कीर्ण मूर्तियां खुदाई के बाद जीवंत हालत में मिली थी, जिसमें अधिकांश मूर्तियां संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गई। स्तूप की दीवारों में सटे प्लेट में उत्कीर्ण चित्र बौद्ध धर्म और सनातन धर्म से संबद्ध थी।

श्रोत: हिन्दुस्तान