विद्या की देवी सरस्वती

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सुप्रिया सिन्हा

पटना- सरस्वती हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं और विद्या की देवी है उन्हें ब्रह्मा की मानसपुत्री कहा जाता हैं जो, विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी गई है। पंचांग के अनुसार वसंत पंचमी माघ महीने की पंचमी तिथि को बड़ी धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इसी दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। शिक्षा संस्थाओं में वसंत पंचमी को सरस्वती का जन्मदिन समारोह पूर्वक मनाया जाता है।

सरस्वती जी का श्लोक इस प्रकार है-

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥

शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥

वसंत सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ ऋतु मानी जाती है। इस ऋतु में न तो अत्यधिक गर्मी का अनुभव होता है और न ही कड़कड़ाती ठंड का। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में ‘ऋतूनां कुसुमाकर:’ कहकर ऋतुराज वसंत को अपनी विभूति माना है। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद वसंत पंचमी पहला उत्सव होता है। भारत में वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन किसी भी कार्य का शुरुआत बहुत शुभ होता है। छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। बिहार और पश्चिम बंगाल में वसंत पंचमी के दिन सरस्वती का विशेष महत्व है। न सिर्फ घरों में बल्कि शिक्षण संस्थाओं में भी इस दिन सरस्वती पूजा का आयोजन बड़े उमंग और हर्षोल्लास के साथ किया जाता है। इस दिन माँ सरस्वती के प्रतिमा पर फूल अर्पित कर, वाद्य यंत्रों की पूजा की जाती। माँ की चरणों में पीले गुलाल, मिठाई एवं फल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र पहनती हैं। पीला रंग परंपरा से शुद्धता और ऊर्जा का प्रतीक है। इसी मौसम में सरसों में फूल आते हैं। जिनका रंग पीला होता है। वसंत पंचमी पर सरसों का खेत लहलहा उठते हैं। चना, जौ, गेंहू की बालियां खिलने लगती है। मौसम सुहाना हो जाता है और पेड़-पौधों में नए फल-फूल पल्लवित होने लगते हैं।

सरस्वती पूजा को लेकर एक प्रचलित कथा भी है

भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापति ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करके जब उस संसार में देखते हैं तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही दिखाई देता था। उदासी से सारा वातावरण मूक सा हो गया था जैसे किसी के पास वाणी न हो। यह देखकर ब्रह्माजी ने अपने कमंडल से जल लेकर छिड़का। उन जलकणों के पड़ते ही पेड़ों से एक शक्ति उत्पन्न हुई। जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी और दो हाथों में पुस्तक और माला धारण की हुई थीं। इसलिए इस देवी को सरस्वती कहा गया। यह देवी विद्या और बुद्धि देने वाली है। इसलिये वसंत पंचमी के दिन हर घर में सरस्वती की पूजा की जाती है।