शिक्षकों के हाथ में है राष्ट्र निर्माण का दायित्व

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साठ के दशक में आई कोठारी कमिशन की रिपोर्ट ने यह रेखांकित किया था कि भारत का भाग्य इस देश की कक्षाओं में निर्मित होता है। यह कोई साधारण बात नहीं है कि इन कक्षाओं में शिक्षक भारत के भाग्य निर्माता बने हुए हैं। उनके ही हाथों में भारत का सौभाग्य और दुर्भाग्य भी है। अगर यह तथ्य इतना गंभीर है तो उतनी ही गंभीरता पूरे शिक्षण प्रक्रिया में नज़र क्यूं नहीं आती ?

14 से 16 मई के बीच पटना के संत ज़ेवियर कॉलेज में ‘ट्रान्सफॉर्मेशनल टीचींग’ पर एक वर्कशॉप आयोजित हुई जो प्रसिद्ध वक्ता तथा टीचर ट्रेनर प्रो0 जेयकर चेल्लाराज की अध्यक्षता में आयोजित थी। प्रो0 चेल्लाराज 2002 में तिरुचिरापल्ली के बिशप हेबर कॉलेज से प्रिंसिपल के पद से सेवा-निवृत्त हुए थे। उन्होंने ‘ट्रॉन्सफॉरमेशनल कम्युनिकेशन’ शीर्षक पुस्तक भी लिखी है। देश-विदेश में उन्होंने कई व्याख्यान दिए हैं।

उर्जा से भरपूर 71 वर्षीय प्रो0 चेल्लाराज शिक्षण को एक नए नज़रिए से देखते हैं। आमतौर पर शिक्षण प्रक्रिया बड़ी ही यंत्रवत नज़र आती है। कहीं भी वहां भावनाओं पर बल नहीं दिया जाता। पर चेल्लाराज शिक्षण को एक अलग-थलग प्रक्रिया के रूप में नहीं देखते।

वे कहते हैं कि छात्रों को अपने शिक्षक, अपने विषय, शिक्षण प्रक्रिया, संस्थान और साथ ही साथ अपने देश से भी प्रेम होना चाहिए। जिस विषय को वे पढ़ रहे हैं, उसके बारे में उन्हें ये सोचना चाहिए कि वो कितना लाजवाब विषय है। शिक्षा महज याद रखने की चीज नहीं बल्कि अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए होती है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ समझाते हुए चेल्लाराज बताते हैं कि “शिक्षा इंसान के साथ हमेशा रहती है, उस समय भी जब वह अपना सारा पढ़ा-लिखा भूल गया हो।’

महात्मा गांधी ने कहा है कि अगर आप किसी व्यक्ति को सिर्फ मानसिक तौर पर शिक्षित करते हैं और उसे नीतिगत शिक्षा नहीं देते तो आप समाज के लिए खतरा पैदा करते हैं।

समाज ने शिक्षकों को बदलाव का वाहक बनाया है। चेल्लाराज मानते हैं कि शिक्षक होना गौरवपूर्ण है और ये मौका मिलना किस्मत की बात है। वे कहते हैं कि शिक्षकों को अपना कार्य पूरे मनोयोग से करना चाहिए; वैसे शिक्षक जो अपना कार्य ईमानदारीपूर्वक नहीं करते, वे  राष्ट्र का अहित कर रहे हैं।

जी बी शॉ के नाटक पिगमेलिएन में एलाइज़ा डूलिटिल अपने प्रेमी फ्रेडी से कहती है कि डॉ हिगिन्स मुझे हमेशा फूलवाली के रूप में देखते हैं इसलिए उनके नज़र में मैं हमेशा एक फूलवाली ही रहूंगी पर तुम मुझसे हमेशा एक लेडी (कुलांगना) की तरह व्यवहार करते हो, इसलिए तुम्हारे लिए मैं वही रहूंगी।

इसके आधार पर शिक्षक-छात्र संबंध का जिक्र करते हुए चेल्लाराज ‘पिगमेलिएन इफेक्ट’ का जिक्र करते हैं। वे कहते हैं कि शिक्षक छात्रों के साथ वैसा व्यवहार करें जैसा वे उन्हें बनते हुए देखना चाहेंगे, वैसा नहीं जैसा वे उन्हें पाते हैं। छात्रों के लिए कड़े लेबल्स का इस्तेमाल वे गलत मानते हैं।

अगर शिक्षक पढ़ाएं और छात्र कुछ सीखें हीं ना, तो चेल्लाराज इसे शिक्षण का दोष मानते हैं। वे कहते हैं कि प्रभावी संप्रेषण के लिए दोनों के बीच अच्छा संबंध होना जरूरी है।