शेरशाह सूरी का मकबरा: अफगानी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना

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पटना: सासाराम का नाम सुनते ही दिल व दिमाग में शेरशाह सूरी की तस्वीर बन जाती है वही शेरशाह सूरी जिन्होंने ग्रांड ट्रंक रोड बनवाया था। आज उसी भूमि यानी सासाराम का चर्चा करते है। सासाराम बिहार की राजधानी पटना से लगभग 160 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। सासाराम रोहतास जिले का मुख्यालय है जो ग्रांड ट्रंक रोड पर बसा एक छोटा सा शहर है।

सासाराम में ही शेरशाह सूरी का मकबरा स्थित है। इस मकबरे को भारतीय-अफगान वास्तुशिल्प के भव्य नमूनों में से एक समझा जाता है। अफगानी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना शेरशाह का मकबरा अपने एतिहासिक महत्व के साथ ख़ूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। अपने शासनकाल (वर्ष 1540-1545 ईस्वी) में शेरशाह सूरी को समूचे भारतीय मध्ययुग के सबसे महत्वपूर्ण शासकों में गिना जाता है। महाराजा शेरशाह सूरी की याद में 15वीं सदी में सासाराम में एक तालाब के बीच मकबरा बनवाया गया था। शेर शाह सूरी को ‘शेर खान’ के नाम से भी जाना जाता है।

यह मकबरा ईंटों से बनी एक शानदार इमारत है जिसमें अंशत: पत्थर लगे हैं और जो लगभग 305 मीटर माप वाले एक भव्य वर्गाकार तालाब के मध्य में पत्थर के एक बड़े चबूतरे पर खड़ी है। 9.15 मीटर ऊंचा चबूतरा, प्राकार-दीवार से घिरा है जिसके चार कोनों पर अष्टकोणीय गुम्बदनुमा मंडप हैं।

इसके चबूतरे के मध्य में मुख्य कब्र अष्टभुजाकार कम ऊंचाई के एक छोटे चबूतरे पर स्थित है। इस भवन में एक बड़ा अष्टकोणीय कक्ष है जिसके चारों ओर 3.10 मीटर चौड़ा एक बरामदा है। अष्टकोण की प्रत्येक भुजा लगभग 17.00 मीटर की है। मुख्य गुम्बद के चारों ओर अष्टभुज के किनारों पर आठ स्तंभवाले गुम्बज लगे हैं। चबूतरे के ऊपर इस मकबरे की कुल ऊंचाई 37.57 मीटर है।

गुम्बद का भीतरी भाग पर्याप्त रूप से हवादार है और दीवारों के ऊपरी भाग पर बनी बड़ी-बड़ी खिड़कियों से रोशनी भी पर्याप्त आती है। पश्चिमी दीवार पर मेहराब के ऊपर छोटे मेहराबनुमा आलों पर दो पंक्तियां लिखी हुई हैं जिन्हें सलीमशाह द्वारा मकबरे के पूरा होने पर जुमदा के सातवें दिन हिजारी 952 (16 अगस्त, 1545 ईस्वी ) में शेर शाह सूरी की मृत्यु के लगभग तीन माह बाद लिखा गया था। खिड़कियों पर की गई बारीक नक्काशी पर्यटकों को उस समय की कारीगरी की दाद देने को मजबूर कर देती हैं।

कहा जाता है कि इस मकबरे में शेरशाह की कब्र के अतिरिक्त 24 और कब्रें हैं, जो उनके परिवार के सदस्यों, मित्रों और अधिकारियों के हैं। सभी पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं।
अगर हम शेरशाह सूरी की इतिहास पर नजर डालते है तो पाते है कि शेरशाह सूरी वास्तव में भारत के राष्ट्रीय नायकों में से शा। शेरशाह सूरी मूल नाम फरीद खान था। शेरशाह सूरी बहादुर, बुद्घिमान, पैनी राजनैतिक परख रखने के साथ-साथ व्यवहार कुशल सैन्य प्रशासक होने के अलावा नगर प्रशासन में भी असाधारण कौशल और योग्यता रखने वाला व्यक्ति था।

शेरशाह सूरी के पिता हसन शाह सासाराम के जागीरदार थे। शेरशाह सूरी का जन्म सन 1472 ईसवी में हुआ था और उसने अपनी औपचारिक शिक्षा जौनपुर से प्राप्त की थी। अपनी विशेषताओं के कारण उसने अपने कार्य की शुरूआत एक छोटे जागीरदार के रूप में की और वह मुगल बादशाह, हुमायूं को हराने के बाद सन 1540 ईसवी में दिल्ली के गद्दी पर जा बैठा। लेकिन बदकिस्मती से वह पांच वर्ष की एक छोटी अवधि तक ही शासन कर सका। रबी-उल-अवाल के दसवें दिन हिजरी संवत 952 या 13 मई 1545 ईसवी को कालिंजर के किले में एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई।

शेरशाह ने एक स्वतंत्र राजवंश, सूर-अफगान की स्थापना की। उसने विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक उपलब्धियां प्राप्त की थी। उसने अपने संपूर्ण साम्राज्य में कानून और व्यवस्था की पुन:स्थापना की और व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा दिया। शेरशाह सूरी ने कोलकाता से पेशावर के बीच चलने वाले पुराने राजमार्ग जिसे ग्रांट ट्रंक रोड़ कहते हैं को फिर से चालू करवाया और आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक एक सड़क का निर्माण करवाया जो गुजरात बंदरगाह के मार्ग को जोड़ती है और तीसरा मार्ग लाहौर से मुल्तान तक बनवाया जो पश्चिम और मध्य एशिया में जाने वाले काफिलों के लिए था।

यात्रियों की सुविधाओं के लिए उसने इन मार्गों पर अनेक सरायों का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त, उसने ‘रूपए’ मुद्रा का प्रारंभ किया और एक व्यवस्थित डाक सेवा की शुरुआत की।

शेरशाह सूरी एक महान निर्माता भी था। उसने दिल्ली के निकट यमुना नदी के किनारे पर एक नया नगर बसाया था जिसमें से केवल पुराना किला ही बचा है। इसके भीतर मस्जिद है जो प्रचुर सजावट के लिए जानी जाती है। लेकिन वास्तुशिल्प के क्षेत्र में उसने उत्कृष्ट योगदान सासाराम, बिहार में अपना स्वयं का मकबरा बनवा कर दिया जो सादगी और लालित्य का मिला-जुला रूप है।

सासाराम में उसके पिता, हसन शाह और उसके पुत्र, सलीमशाह का मकबरा भी वास्तुकला तथा पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

अफगान वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना होने के कारण संयुक्त राष्ट्र ने 1998 में इस मकबरे को विश्व धरोहरों की सूची में स्थान दिया।