सिक्के बताएंगे अगमकुंआ का इतिहास

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अगमकुंआ के सिक्कों को बाहर निकालकर यहां के इतिहास को खंगाला जाएगा। हालांकि दो बार पहले भी प्रयास हो चुके हैं, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। इसलिए पुरातत्व निदेशालय, बिहार सरकार एक नई योजना बना रहा है। अगले वर्ष कुएं को साफ कर इसके गाद में जमे सिक्के को छान कर बाहर निकाला जाएगा।

अगमकुंआ में सिक्के चढ़ाने की प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि शीतला देवी के मंदिर में पूजा-पाठ के बाद इस कुएं में पैसा डालने से हर मन्नत पूरी होती है। कई लोग मन्नत पूरी होने के बाद भी आते हैं और इस कुएं में पैसे डालते हैं। कुएं के तल में नौ-दस फीट का गाद बैठ गया है। इसमें बड़ी मात्रा में सिक्के होने की संभावना है।

सिक्के निकालने का पहला प्रयास 20वीं सदी के आरंभ में अंग्रेजों ने किया था। इसके लिए 50 पानी निकालने वाले नियुक्त किए गए थे, जो कुएं में उतरकर घड़े में पानी व गाद भरते थे। उसे खींचकर ऊपर लाया जाता था। पानी निकालने वाले को दो आना प्रति घड़े के हिसाब से मजदूरी दिया जाता था जिसका विवरण पटना अभिलेखागार में मौजूद है। लेकिन भूमिगत जल का स्तर ऊपर होने के कारण पानी निकालने के बाद फिर भर जाता था। दूसरा प्रयास 1995 में पूरातत्व निदेशालय ने किया। वाटर टेबल के बहुत ऊपर होने के कारण उस समय भी समस्या आई थी। गाद निकालने में मदद के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी राजबाला वर्मा ने फायर ब्रिगेड के दस्ते को भी भेजा, लेकिन कुएं में निचले स्तर पर आक्सीजन की कमी थी। इसलिए फायर ब्रिगेड दस्ते ने भी हाथ खड़े कर दिए थे।

पुरातत्व निदेशालय ने एक बार फिर से अगम कुंआ की सफाई का निर्णय लिया है। अगले वर्ष उसे कार्यरुप दिया जाएगा। इस बार पानी निकालने और गाद की सफाई के लिए अत्याधुनिक तकनीक और साधनों का सहारा लिया जाएगा। इसके लिए कार्ययोजना बनाई जा रही है। पानी और गाद निकालने के बाद उसे छान कर सिक्कों को बाहर निकाला जाएगा।

सफाई के बाद मिले सिक्कों से अगमकुंआ के साथ पाटलीपुत्र के इतिहास पर भी नई रोशनी पड़ने की संभावना है। सिक्के धातु, आकार, शुद्धता और उन पर अंकित प्रतिरूप और संवत से स्पष्ट हो जाएगा कि अगम कुंआ का निर्माण वास्तव में मौर्य काल में हुआ या ये महज किंवदंती है। पाटलीपुत्र किस काल में किस शासक वंश के अधीन रहा इस संदर्भ में भी ये एक बड़े प्रमाण होंगे।

अगमकुंआ को कई इतिहासकार मौर्य काल में निर्मित मानते हैं। कुछ बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों का सर काटकर इसमें डाल दिया था। हालांकि कई इतिहासकार इसे किंवदंती मानते हैं जो सुनी सुनाई किस्से-कहानियों पर आधारित हैं।

बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने कहा है कि अगमकुंआ की अगले वर्ष सफाई होगी और इसके गाद से सिक्कों को छानकर निकाला जाएगा। यदि प्रयास सफल रहा तो इसमें अगमकुंआ और पटना के इतिहास पर नई रोशनी पड़ सकती है।

बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष आचार्य किशोर कुणाल ने कहा कि वे ऐसे प्रयासों का स्वागत करते हैं। अगमकुंआ की सफाई से नए रहस्योदघाटन हों और उससे इतिहास लेखन में मदद मिले तो यह अच्छी बात है।

Dainik Bhaskar