सुपौल के इस मंदिर में भीम ने की थी भोलेनाथ की पूजा

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बिहार के सहरसा फारबिसगंज रेलखंड पर सुपौल जिला स्थित है। सुपौल जिला वर्तमान सहरसा जिले से 14 मार्च 1991 में विभाजित होकर अस्तित्व में आया। सांस्कृतिक रुप से यह काफी समृद्ध जिला है। नेपाल से करीब होने के कारण यह सामरिक रुप से काफी महत्वपूर्ण है।

सुपौल की स्थापना पाल वंश के शासकों दूारा की गई थी। क्षेत्रफल के अनुसार ये कोसी प्रमंडल का सबसे बड़ा जिला है। वीरपुर, त्रिवेणीगंज, निर्मली, सुपौल आदि इसके अनुमंडल है। पर्यटन स्थलों में गणपतगंज का विष्णु मंदिर, धरहरा का महादेव मंदिर, वीरपुर में कोसी बैराज, हुलास का दुर्दा महादेव मंदिर आदि प्रमुख है।

सुपौल जिले के राघोपुर स्टेशन से सात किलोमीटर की दूरी पर धरहरा गांव स्थित भीमाशंकर महादेव नामक देवस्थल जिले के दूादस ज्योतिलिंग के रुप में जाना जाता है। बताया जाता है कि पांडवों दूारा अज्ञातवास के दौरान विराटपुर जाने के दरम्यान पांडव पुत्र भीमसेन ने यहां रुक कर बाबा भोले की पूजा-अर्चना की थी। उसी समय से लोग इस देवस्थल को भीमशंकर महादेव के नाम से जानने लगे। रविवार और सोमवार को यहां शिव भक्तों की अच्छी-खासी भीड़ जुटती है।

लोकगायिका शारदा सिन्हा और स्व. पंडित ललित नारायण मिश्र यहां के विशिष्ठ व्यक्तित्व के रुप में मशहूर है। प्राचीन काल के पाल वंश के सम्राज्य का हिस्सा रहे सुपौल का इतिहास महाभारत काल से शुरु होता है।

सुपौल नंद, मौर्य, शुंग और मिथिला राजाओं के अदीन रहा। इनके बाद मुस्लिम और मुगल सम्राटों ने राज किया। बाद में सुपौल भी अंग्रेजी साम्राज्य का अंग बन गया। ब्रिटिश काल में सुपौल के प्रशासनिक और सामरिक महत्व देखते हुए 1870 में इसे अनुमंडल का दर्जा दिया गया।

अनुमंडल बनने के करीब 121 सालों के बाद सुपौल को 1991 में जिला बनाया गया। आज कोसी की इस उपेक्षित धरती पर भी विकास की गाथा लिखी जा रही है। और फिर क्या था रोज नये रुप में दिखने लगा सुपौल। सड़कों का जाल सा बिछ गया, कोसी पर महासेतु तो कोसिवासियों के लिए नई जिंदगी ही दे गया है।