सुरेश भट्ट जिसके लिए समाज ही औलाद

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सुरेश भट्ट का जाना…
मन लागो मेरो राम फकीरी में!!

सुरेश भट्ट यानी जनता के एक ऐसे नेता जो तमाम ‘वाद’ से ऊपर थे…जिसके भीतर एक ही बैचेनी थी शोषित-पीड़िता जनता की मुक्ति के लिए लड़ना…एक ही विचारधारा, आजाद देश में कोई गुलामी ना खटे, कोई बंधुआ ना बने…शायद इसिलिए कई आंदोलनों के अगुआ और सहयात्री रहे सुरेश भट्ट…एक यायावर राजनीतिक कार्यकर्ता जो जनता की निगाह में तो नेता थे लेकिन ताजिंदगी बना रहा एक ग्रास रूट एक्टिविस्ट…समाजवादी आंदोलन हो, जेपी का छात्र आंदोलन या संपूर्ण क्रांति हो, नक्सलवादी आंदोलन हो, बंधुआ मजदूर मुक्ति आंदोलन हो या फिर नागरिक स्वतंत्रता के लिए पीयूसीएल जैसा मूवमेंट…बढ़ी हुई दाढ़ियोंवाला एक चेहरा सुरेश भट्ट जनसंघर्ष के हर मोर्चे पर परचम लहराते हुए दिख जाता था…

सुरेश भट्ट की संगत में जवान हुए जाने कितने राजनीतिज्ञ जो आज सत्ता-सियासत के नामी चेहरे हैं लेकिन उन्हें भुला दिया… कभी जयप्रकाश नारायण, मधु लिमये, नानाजी देशमुख सहित उस दौर के अन्य नेताओं के परमप्रिय रहे सुरेश भट्ट…लालू, नीतीश सहित बिहार के कई नेता कभी सुरेश भट्ट को ‘गुरूजी’ कह कर प्रणाम करते थे लेकिन शायद आज उनकी मौत की खबर से भी अनजान हों…भट्ट साहब ताउम्र समाज को तो सब कुछ देते रहे लेकिन लिया कभी कुछ नहीं…बिहार के नवादा निवासी सुरेश भट्ट ने अंतिम सांस आज दिल्ली के एक ओल्ड एज होम में ली…

उनकी बड़ी बेटी असीमा भट्ट मुंबई में रहती हैं…वो कवयित्री और टीवी धारावाहिकों की बड़ी कलाकार हैं…असीमा ने एक बार अपने एक पोस्ट में अपने पिता के बारे में लिखा था- ‘समाज के सिवा पापा ने किसी को औलाद माना ही नहीं। सिनेमा हॉल और करोड़ो की जायदाद के मालिक जिनका ईंट का भट्टा और अनगिनत संपति थी, सब को छोड़ने के साथ अपनी पत्नी और चार छोटे-छोटे बच्चों को भी छोड़ दिया, सालों जेल में गुजारा। लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार और जार्ज फर्नांडिस तक उन्हें गुरुदेव कह कर संबोधित करते थे। सारे कॉमरेडों के वो आईडियल थे, फकीरों की तरह जीवन जीया।

सुरेश भट्ट् के साथ कई मोर्चों पर एक साथी के बतौर रहने का सौभाग्य मुझे भी मिला…अपनी जिंदगी की अंतिम लड़ाई वे अकेले लड़े इसका गम है लेकिन ये गम एक बड़ा सवाल भी कि समाजसेवा और राजनीति के जरिए जो रूतबेदार बन गए उनके साथ तो जमाना चलता है…लेकिन जिसने सत्ता सुख को दो कौड़ी का समझा और फकीरों की तरह की समाजसेवा क्या वह रह जाएगा अकेला…क्या यह जन राजनीति से कॉरपोरेट राजनीति तक पहुंचती ‘सेवा और सियासत’ का नया चेहरा है?…वैसे यह भी सच है कि सुरेश भट्ट् जैसे कबीरा मन वालों से भी शेष नहीं ये समाज और यही है समाज की ताकत…चलीए एक बार फिर याद कर लें कबीर को…मन लागो मेरो यार फकीरी में, जो मजा आए राम भजन में वो मजा नहीं अमीरी में…मन लागो मेरो यार फकीरी में!!!

वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु के फेसबुक वाल से