सुविधा और संसाधन के अभाव में बिखर गये सुरेश के सपने

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जहानाबाद- सपने देखने पर किसी को रोक नहीं है। कोई भी इंसान कैसा भी सपना देख सकता है और लाखों करोड़ो लोग खुद को लेकर बड़े सपने देखते हैं पर कुछ गिने-चुने हीं पूरा कर पाते हैं। ऐसा हीं एक सपना 90 के दशक के समय देखा था जहानाबाद के सुरेश कुमार ने। परन्तु सुविधा और संसाधन के अभाव में उसके सपने बिखर गये। वह सड़कों पर ठेला लगाकर पेट पालने को विवश हैं। सुरेश कुमार 90 के दशक में जब क्रिकेट खेलते थे तो उनकी धुआंधार बैटिंग को लोग देखते हीं रह जाते थे। उस जमाने में भारतीय क्रिकेट स्टार ‘‘कपिल देव’’ को अपना आर्दश मानने वाले सुरेश कुमार की बैटिंग का खौंफ विरोधी टीमों और गेंदबाजो पर साफ दिखाई देता था। वह जब बैटिंग करने उतरते तो मैदान के चारो ओर चौकों और छक्कों की बरसात हो जाती थी। रनों में चौकों से ज्यादा छक्को की भरमार होती थी।

सुरेश जब क्रिकेट खेला करते थे उस वक्त तो जहानाबाद में खेलने लायक गांधी मैदान, गांधी स्मारक, हवाई अड्डा और दरधा नदी के किनारे तरबना का मैदान हीं मौजूद था। जबकि अब शहर में एक शानदार स्टेडियम भी उपलब्ध है। सुरेश पुराने दिनों को याद करते करते भावूक हो जाते हैं और कहते हैं वो क्या दिन थे उनकी बैटिंग को लेकर दुसरे जगहों से लोग उन्हें ‘‘बोरो’’ के रूप में ले जाते थे और कितना सम्मान मिलता था। परन्तु समय और संसाधन के अभाव में सब बिखर गया। समय के साथ साथ बढ़ती जिम्मेवारियों ने हाथों में बल्ले की जगह ठेला थमा दिया।

सुरेश कुमार प्रतिदिन अस्पताल मोड़ से चूना गली के बीच अपना ठेला लगा कर मौसमी फलों को बेचकर अपना और परिजनों का जीवन यापन करते हैं। चार बच्चियों और दो बच्चों के पिता सुरेश कुमार को इस बात का मलाल है कि उनका अब तक राशन कार्ड भी नही बन सका है। बहरहाल सुरेश कुमार जैसे अपने जमाने के धांसू बल्लेबाज अगर पंजाब, हरियाणा, मुम्बई या पश्चिम बंगाल सरीखे दुसरे स्टेट में पैदा होते तो वे कम से कम रणजी या दिलीप ट्राॅफी तो खेल हीं सकते थे। परन्तु ऐसा हो न सका और अपने जमाने का ‘‘धोनी’’ अब सड़कों की धूल फांक रहा है।