स्वतंत्रता की यात्रा

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भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में बिहार की अग्रगण्य भूमिका रही है। सच तो यह है कि बिहार की पुण्य भूमि प्रत्येक आन्दोलन का गर्भगृह रही है। एक ओर जहाँ कला, संस्कृति, दर्शन और राजनीति में इसकी अमिट पहचान है, वहीं लोकतंत्र, स्वतंत्रता एंव देशभक्ति में इसने कीर्तिमान स्थापित किये हैं। लिच्छवियों का प्रथम गणराज्य होने का श्रेय इसी बिहार को है। मगध के शासकों की यही कर्मभूमि रही है। विद्या के क्षेत्र में नालंदा, विक्रमशिला और ज्ञान के साधक की तपोभूमि बोध गया कालजयी धरोहर हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में 1857 का विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम उदघोष था जिसमें बिहार के अनेक लोगों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संधर्ष किया था जिसमें बाबू कुंवर सिंह का नाम अग्रगण्य है। उस लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देनेवालों में पटना के पीर अली खां, रांची के शेख भिखारी, पलामू जिले के पीताम्बर शाही, नीलाम्बर शाही ,लोहरदगा जिले के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आगे चलकर महात्मा गाँधी ने 1917 में चम्पारण में अंग्रेजों के विरुध्द अभियान आरंभ किया जिससे प्रेरित होकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, राजकुमार शुक्ल, श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, कृष्ण वल्लभ सहाय, जयप्रकाश नारायण, अब्दुल बरी, डॉ. लम्बोदर मुखर्जी जैसे कर्मठ स्वतंत्रता सेनानियों ने संधर्ष किया। स्वदेशी का अभियान चला और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया। जगह –जगह लोगों ने कीमती विदेशी कपड़ों की होली जलाई। नमक सत्याग्रह हुआ और समुद्री नमक जिसे पंगा नमक कहा गया, का प्रचार हुआ। पूरे देश में अंग्रेजी शासन के विरुध्द जन- आन्दोलन को सक्रिय किया गया।

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प्रथम विश्व युध्द से ही देश में स्वतंत्रता की मांग जोर पकड़ रही थी और ब्रिटिश सरकार अपने वादे से मुकर गई थी। इसी कारण द्वितीय विश्व युध्द के समय तो कई नेतागण ब्रिटेन को समर्थन देने के पक्ष में नहीं थे। आखिर भारत ने समर्थन तो किया मगर आजादी नहीं मिली। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता आन्दोलन दिनों दिन जोर पकड़ रहा था, और भारत के लोग अधीर हो रहे थे। नौजवानों में अंग्रेजी शासन के विरूध्द आक्रोश बढ़ रहा था। गाँधीजी पुरे देश के सर्वमान्य नेता हो चुके थे। सभी तबकों, सभी जातियों और धर्मो के बीच लोकप्रिय थे। उनके आहवान पर हर कोई देश के लिए मर –मिटने को तैयार था। गाँधीजी का सविनय असहयोग आन्दोलन भी प्रभावहीन साबित हुआ था। उधर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सशस्त्र आन्दोलन को तैयार थे। बिहार में गांधीजी ने पटना और नालंदा में लोगों को सम्बोधित किया और अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने का आहवान किया। परिणामस्वरूप लोगों ने दल बनाकर जगह –जगह सभाएं कीं और नौजवानों को ललकारा। 1940 आते-आते हर जगह अंग्रेजी सरकार के विरूध्द वातावरण तैयार हो गया था। सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों का विरोध हो रहा था। 8 अगस्त 1940 को लहेरियासराय में नव जवान संध का सम्मेलन हुआ जिसमें स्वतंत्रता आन्दोलन को तेज करने का संकल्प लिया गया। लोगों ने कॉलेजों और स्कूलों में जाकर छात्रों से स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने का आहवान किया। सितंबर 1940 में प्रो0 हुमायूं कबीर ने झरिया में छात्रों की एक सभा को सम्बोधित कर गाँधीजी के आन्दोलन में भाग लेने की अपील की, ब्रिटिश सरकार के शोषण के प्रति जागरूक किया।

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नौजवानों ने पटना, मुजफ्फरपुर और दरभंगा में सरकार की दमन विरोधी कार्रवाइयों का विरोध किया और दमन विरोधी संगठन तैयार किया। इसी क्रम में बांकीपुर मैदान में नजरबंद दिवस मनाया गया। शाहाबाद में छात्रों का सम्मेलन हुआ। 13 अप्रैल 1941 को सूर्यगढ़ा में छात्रों का सम्मेलन हुआ। बेनीपुरीजी ने अपने ओजस्वी भाषणों से छात्रों में देशभक्ति एंव स्वतंत्रता की भावना को जागृत किया। डॉ. सैयद महमूद ने लोगों को आपसी मतभेद भूलकर अंग्रेजों से निजात पाने के लिए एक होने की अपील की। आखिरकार 8 अगस्त 1942 को बम्बई (मुम्बई ) में कांग्रेस कार्यकारिणी कमिटि ने अंग्रेजों ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का संकल्प पारित किया। गाँधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा, …… स्वतंत्रता के लिए और अधिक प्रतिक्ष नहीं कर सकता। यह मेरे जीवन का अंतिम संधर्ष है। …… या तो हम विजयी होंगे या फिर मिट जाएंगे। गांधीजी ने यह भी कहा, “स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रत्येक भारतीय को प्रयत्न करना चाहिए और प्राण देने को तैयार रहना चाहिए। …. कायर मत बनो। कायरों को जीवित रहने का कोई अभिकार नहीं है। स्वतंत्रता हमारा मंत्र होना चाहिए” , ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की खबर रातो-रात पूरे देश में फैल गई। दूसरे ही दिन देश के बड़े –बड़े नेता महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद गिरफ्तार कर लिए गए। फिर तो सारे देश में क्रांति की आग भड़क उठी। स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बज उठा। पूरा देश कमर कसकर अंग्रेजी शासन से लड़ने के लिए तैयार हो गया। उधर प्रशासन ने चुन –चुनकर कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

पटना में राजेन्द्र बाबू को गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल भेज दिया गया। इसकी खबर पाते ही बी.एन. कॉलेज, पटना के विद्यार्थी बौखला उठे। उन्होनें आनन –फानन में एक जुलूस निकाला जिसमें शहर के अन्य कॉलेजों एंव स्कूलों के छात्रों ने भाग लिया। जुलूस ‘वन्दे मातरम’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ ‘हिन्दुस्तान आजाद करो’ जैसे नारे लगाता पटना की मुख्य सड़कों से गुजरता हुआ राजभवन और बांकीपुर जेल तक गया। संध्या समय पटना युनिवर्सिटी लाइब्रेरी परिसर में विद्यार्थियों ने सभा की और सभी छात्रों को महात्मा गाँधी के ‘करो या मरो’ के आहवाहन पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के लिए ललकारा। विद्यार्थियों को पढ़ाई छोड़ने, वकीलों को कचहरी का परित्याग करने तथा आम जनता को कर न देने का आहवान किया। साथ ही, नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में अगले दिन दुकानें बंद रखने और स्कूल- कॉलेजों में हड़ताल करने की अपील की गई। 10 अगस्त को पटना में श्रीकृष्णा सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, सत्यनारायण सिन्हा और महामाया प्रसाद भी गिरफ्तार कर लिए गए। इन नेताओं की गिरफ्तारी की व्यापक प्रतिक्रिया हुई। खासकर विद्यार्थियों ने अपने नए खून की गर्मी में पुरे राज्य को झकझोर दिया। छात्र – छात्राओं ने स्कूल- कॉलेजों का बहिष्कार किया। गोलघर के पास बालिका उच्च विद्यालय को भी छात्रों ने बंद करवाया। यही नहीं, विद्यार्थियों ने बी.एन कॉलेज पटना, साइंस कॉलेज, पटना ट्रेनिंग कॉलेज, प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज, महिला छात्रावास, इंजीनियरिंग कॉलेज, राम मोहन राय सेमिनरी स्कूल तथा पी.एन ऐंग्लो संस्कृत स्कूल पर तिरंगा झंडा फहराया। अपने नेताओं की गिरफ्तारी की प्रतिक्रिया ऐसी थी की पटना अस्पताल में जूनियर डॉक्टर, नर्सो और सफाई कर्मचारियों ने भी सम्पूर्ण हड़ताल की। बाद में राजेन्द्र बाबू के खिले पत्र पर ही लोग कम पर आए लेकिन विद्यार्थियों ने फिर भी अपनी हड़ताल न तोड़ी।

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दानापुर में तीनों हाई स्कूलों के छात्रों ने हड़ताल की और सीताराम केसरी तथा हरे किशुन सिंह ने नेतृत्व में जुलूस निकाला। हाथों में तिरंगा झंडा लिए नारे लगाते इन नोजवानों ने अंग्रेजी सरकार की निषेधाज्ञा की अवहेलना की। पटना यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी मैदान में सकूल- कॉलेज के करीब चार हजार छात्र –छात्राओं ने सभा की जिसका सभापति पटना कॉलेज के कृष्ण प्रसाद ने किया। इसमें आन्दोलन को तेज करने तथा सरकारी कर्मचारियों को कार्यालय जाने से रोकने का निर्णय लिया गया. लोगों ने दुसरे दिन 11 अगस्त को सचिवालय, न्यायालय और पुलिस लाईन पर तिरंगा झंडा फहराने तथा पिकेटिंग करने की योजना बनाई। उन्होंने एक जुलूस निकालकर सभी लोगों से इस स्वतंत्रता यज्ञ में हर प्रकार से सहयोग करने की अपील की।
संध्या समय लॉन (गांधी मैदान) में पटना नगर कांग्रेस कमिटि के महामंत्री शिवनन्दन प्रसाद की अध्यक्षता में सभा हुई जिसमें लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। सभा में लोगों ने हाथ उठाकर गंगा की कसम खायी और एक स्वर से स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने का संकल्प किया।

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महिला चरखा समिति ने महिलाओं का जुलूस निकाला और कदमकुआं के कांग्रेस मैदान में राजेन्द्र प्रसाद की बहन भगवती देवी की अध्यक्षता में बैठक की। जगत नारायण लाला की पत्नी राम प्यारी देवी, शम्भु शरण वर्मा की पत्नी सुन्दरी देवी तथा अन्य महिला वक्ताओं ने अपने जोशीले भाषणों से सरकारी अधिकारियों एंव कर्मचारियों से त्यागपत्र देने तथा वकीलों से वकालत छोड़ने का आहवान किया। उधर गर्दनीबाग पटना में पटना हाई स्कूल के छात्रों ने राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में सभा की जिसमें सभी छात्रों ने भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रति अपनी प्रतिबध्द्ता व्यक्त की। उत्तेजित छात्रों ने तुरंत एक जुलूस निकाला जो आसपास की सडकों से गुजरता हुआ ‘भारत माता की जय’ ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’के नारे लगाता आगे बढ़ा। पुलिस ने जुलूस को रोक। पुलिस के साथ झड़प में कई छात्र गिरफ्तार हुए जिन्हें स्थिति को देखते हुए बाद में छोड़ दिया गया। अपने साथीओं की गिरफ्तारी से भड़के छात्रों ने शाम को बैठक की और शहर के अन्य भागों में आन्दोलन पर विचार –विमर्श किया । सभी लोगों ने एक स्वर से कल के कार्यक्रम में अपनी भागीदारी का ऐलान किया। निर्णय हुआ कि कल सवेरे स्कूल के छात्र मैदान में इकट्ठा होंगे और स्थानीय डाकघर और थाना पर झंडा फहराते पटना सचिवालय पर तिंरगा झंडा फहराएंगे। राजेन्द्र सिंह ने अपने दल को भान मिल का घंटा बजते यानि आठ बजे तक इकट्ठा होने का निर्देश दिया। सभी लोग कल के महा संग्राम के लीए कृत संकल्प थे।

आजादी की लहर हर तरफ व्याप्त थी। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार छात्रों का जत्था विभिन्न दिशाओं से आकर पटना जी.पी.ओ के पास एकत्र हुआ। एक स्वतंत्रता सेनानी दल बी.एन. कॉलेज से जगपति कुमार के पास पीछे मुरादपुर तरफ से होता हुआ लॉन, रेडियो स्टेशन और बांकीपुर रेलवे स्टेशन (सम्प्रति पटना जंक्शन) पार कर जी.पी.ओ. मैदान पहुंचा। रास्ते में नारा लगती भीड़ बढ़ती गई, बढ़ती गई। जोश और उत्साह से भरे छात्रों और नौजवानों का सैलव उमड़ पड़ा। उधर खजांची रोड़, लंगरटोली, कदमकुआं होते राम मोहन राय सेमिनरी के छात्र उमाकांत प्रसाद सिंह तथा रामानन्द सिंह की टोली तथा पटना कॉलेजियट के छात्रों का दल सतीश प्रशाद झा के साथ अपने- अपने हाथों में तिरंगा झंडा लिए निकल पड़ा। रास्ते में सेनानियों की फौज बढ़ती चली गई। देखते ही देखते उधर मिठापुर तरफ से नौजवानों का एक दल नारा लगाता आ पहुंचा। उसके नेता हाई स्कुल पुनपुन के राम गोविन्द सिंह का दस्ता पुरे जोश के साथ आगे बढ़ा। अबतक काफी भीड़ जमा हो चुकी थी। छात्रों के विभिन्न दल हाथों में तिरंगा झंडा लिए नारे लगाते पटना सेक्रेटेरियट की ओर बढ़ चले।

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उनका एक ही मिशन था अंग्रेजी सरकार को हटाकर अपने देश का झंडा फहराना। सेक्रेटेरियट ही बिहार का शासन केंद्र था, इसलिए सेक्रेटेरियट पर झंडा फहराने का अर्थ था, भारत पर स्वदेशी शासन और अंग्रेजी शासन का अंत। अपूर्व जोश और अदम्य शक्ति से ये नौजवान और विद्यार्थिगण आगे बढ़ रहे थे। सड़क के दोनों ओर लाल पगड़ीवाले सिपाही एंव सशस्त्र गोरखा सैन्य पुलिस के जवान तैनात थे। मजिस्ट्रेट गस्त लगा रहे थे। मगर जुझारू विद्यार्थियों की टोलियां बढती गई, सचिवालय की ओर। और हाँ, उधर गार्डिनर रोड़ से मिलर स्कुल से छात्रों का दल आ मिला। अब सचिवालय के आगे लगभग सात हजार लोगों की भीड़ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नारे लगा रही थी। सेक्रेटेरियट के पूर्वी और उधर दक्षिणी द्वार पर नौजवान परिसर के भीतर घुसकर तिंरगा झंडा फहराना चाह रहे थे। शोर मच रहे थे, नारे बुलंद हो रहे थे, पुलिस की टोपियाँ चमक रही थीं,उनकी बन्दूकें सर्तक थीं ‘करो या मरो’ की धुन पर मर –मिटने वालों का अभूतपूर्व दृश्य था। युवा शक्ति का यह प्रदर्शन देश प्रेम का अनुपम उदाहरण था।
सचिवालय को फाटक हर तरफ बंद था, पर स्वतंत्रता सेनानी तीन तरफ से सचिवालय को घेरकर नारे लगा रहे थे और हाथों में कांग्रेसी तिरंगा झंडा लहरा रहे थे। विभिन्न स्कूलों के किशोरों का दल सचिवालय भवन के ऊपर झंडा फहराने को आतुर था।

Sepoy-Mutiny
स्कूली छात्रों के साथ सामान्य नागरिक भी उतावले थे। उन्हें पुलिस के डंडे की परवाह न थी। जब छात्रों का एक दल एक गेट पर जोर लगाकर अंदर नहीं जा सका तो उसने दुसरे गेट पर आवाज लगाना शुरू कर दिया। उनकी बेचैनी किसी तरह परिसर के अंदर घुसकर तिरंगा झंडा फहराना थी। दोपहर से ही आन्दोलनकारियों की बाढ़ आती रही, बढती रही। गर्दनीबाग से आती हुई छात्रों की टोली थाने पर झंडा फहराने की कोशिश में पुलिस से उलझ गई, और अंग्रेजी सरकार के हाथों मार खाती, अदम्य साहस दिखाती सचिवालय के दक्षिणी द्वार पर पहुंची। उस समय पूर्वी मुख्य द्वार के आगे सबसे ज्यादा भीड़ थी. पटना नगर के मिलर हाईस्कुल, राम मोहन राय सेमिनरी, पटना कॉलेजियट, बी.एन. कॉलेज आदि के छात्र सचिवालय परिसर में फैले हुए थे और चारदीवारी के बाहर नारे लगा रहे थे। उत्तरी द्वार पर भी नौजवान अंदर घुसने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। पूर्वी द्वार पर लाल पगड़ीधारी सिपाहियों तथा गोरखा के जवानों का जबर्दस्त बन्दोबस्त था। देखते ही देखते दक्षिणी द्वार पर नौजवान चारदीवारी फांद कर सुरक्षाकर्मियों को धकेलते हुए सचिवालय परिसर के अंदर आ गये औए तिरंगे झंडे के साथ मुख्य भवन की ओर बढ़े। तभी कुछ और पुलिस तथा गोरखा के जवान टूट पड़े और लाठीचार्ज करते हुए नौजवानों को परिसर के बाहर खदेड़ दिया। सार्जेट मेजर के हंटर से कितने ही लोगों क चोटें आई।

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पुलिस छात्रों के साथ बुरी तरह उलझी हुई थी। सुरक्षाकर्मियों का जोर दक्षिणी द्वार की तरफ बढ़ जाने से पूर्वी द्वार की सुरक्षा कमजोर पड़ गई। इधर स्कुली छात्रों का एक जत्था नारा लगाता आया और राम गोविन्द सिंह ने आनन- फानन पूर्वी मुख्य द्वार से उत्तरी स्तम्भ पर चढ़कर तिरंगा झंडा फहरा दिया। पर वे इतने से संतुष्ट न थे। राम गोविन्द सिंह ने ललकारा, “हम मेन बिल्डिंग पर झंडा फहराएंगे अंदर चलो”। और जगपति कुमार, रामानन्द सिंह सहित कई जोशीले विद्यार्थी चारदिवारी फांद कर परिसर के अंदर घुसे. इसे देखते ही पुलिस के ढेर सारे जवान आ गये और नौजवानों को डंडों तथा बंदूक के बट से मारते- पिटते बाहर कर दिया। कितने लोगों के सर फूटे, पैर टूटे पर लोगों ने हिम्मत न हारी। पुलिस ने उस झंडे को उतार कर अपने कब्जे में ले लिया। विद्यार्थियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया। पुलिस अधिकारियों ने घुड़सवार पुलिस को दौड़ाया जिससे भीड़ तितर-बितर हो गई। उधर हल्की बारिश होने लगी फिर भी नौजवान डटे रहे, बल्कि पुलिस की जवाबी कार्रवाई से नौजवानों की भीड़ उठी। लोगों ने रोड़े, पत्थर तथा नारियल फेंकना शुरू कर दिया।

जोर –जोर से नारे लगाने लगे, “भारत माता की जय”, अंग्रेज भारत छोड़ दो, छोड़ दो, “सन संतावन याद करो, याद करो”। अबतक पांच-सात हजार की भीड़ जमा हो चुकी थी और अभी स्वतंत्रता सेनानियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। यही ढाई बजे का समय रहा होगा. अभी –अभी घुड़सवार सैन्य पुलिस का एक और दस्ता आया था। अंग्रेज सार्जेट मेजर गेट के अंदर अन्य अफसरों के साथ चहल-कदमी कर रहा था। आई.जी.ए.ई. विनय तथा डीआईजी जी. सी. जे. क्रीड कलक्टर आर्चर के साथ विचार – विमर्श कर रहे थे। जिलाधिकारी ने छात्रों को समझाने –बुझाने का निर्णय किया। उन्होंने एस.डी.ओ. बाबू गया प्रसाद के साथ पूर्वी गेट के बाहर आकर छात्रों को समझाया, “तुम लोगों का कम हो गया है. अब तुम लोग लौट जाओ। सेक्रेटेरियट पर बिना लाट साहब के हुक्म के झंडा नहीं फहरा सकता”। लेकिन नौजवान झंडा फहराने की बात पर अडिग थे। कोई भी आर्चर की बात सुनने को तैयार नहीं था। आर्चर ने फिर प्रस्ताव रखा “हम लाट साहब को फोन करता है। उसका ऑर्डर हम भी मनेगा और तुम लोग भी मानेगा”। पर कोई भी इस बात पर राजी नहीं हुआ।

हर कोई अंदर जाने को उतारू था। भीड़ धीरे- धीरे फिर गेट के पास लौट आई और गगन भेदी नारे लगाने लगे। स्थिति को संभालने के लिए सरकारी पक्ष इस बात पर जारी हो गया कि पूर्वी गेट पर फिर तिरंगा झंडा फहराने की अनुमति दी जाएगी और तब भीड़ हट जाएगी और भीड़ के हट जाने पर झंडा उतार लिया जाएगा। पर कुछ नौजवानों ने इसे अस्वीकार कर दिया और खा कि हम अंदर जाकर मेन बिल्डिंग पर झंडा फहराएंगे, तभी हम यहाँ से हटेंगे। बातचीत पुन: आगे बढ़ी और कलक्टर आर्चर इस बात पर राजी हो गए, कि दो –दो व्यक्तियों क तिरंगा झंडा के साथ अंदर जाने दिया जाएगा। किशोर आंदोलनकारी इस झांसे में आ गए और जब इस तरह छह विद्यार्थी आगे बढ़े तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भीड़ में फिर खलबली मच गई। शोर होने लगा कि अंग्रेजों ने हमारे साथियों को धोखा देकर गिरफ्तार कर लिया है। अपने साथियों को छुड़ाने के लिए भीड़ गेट तोड़ने पर आमादा हो गई। उधर गोरखा सैन्य पुलिस के जवान संगीनें तानकर खड़े हो गए। आरक्षी उप- महानिरीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार लगभग इसी समय विधान सभा – भवन पर एक ध्वज फहरा दिया गया और सात हजार लोगों की भीड़ ने हर्ष ध्वनि की। लोग प्रसन्न हो गए।

इस बीच एक रहस्यमयी घटना हो गई। हुआ यग कि इधर समझौते की बात चल रही थी और उधर एक वीर सत्याग्रही पशिचम की ओर से चुपचाप मुख्य भवन की सिढी पर चढ़कर दो मंजिले पर जा पहुंचा और एक कमरे में घुसकर लोहे की सिढ़ियां चढकर तीसरी मंजिल पहुंचा और एक लोहे की खिड़की के रस्ते विधान –सभा भवन के शिखर पर बने ध्वज दंड के पास जा पहूँचा। उसके पास छोटा झंडा था। इसलिए उसने अपने कुर्ते को खोल उसमें झंडा को पिन से लगा लिया और “वन्दे मातरम” “भारत माता की जय” का उदघोष करता झंडा फहरा दिया। ब्रिटिश शासन का प्रतीक पटना सेक्रेटेरियट पर भारत का तिरंगा झंडा लहरा उठा। किशोर स्वंतत्रता सेनानियों की मंशा पूरी हुई। लोगों ने देखा की विधान सभा भवन पर तिंरगा झंडा लहरा रहा है। किसी ने कहां कि वह झंडा नहीं, बल्कि रंगीन कुर्ता है. सरकार हमें धोखा दे रही है। परन्तु कलक्टर आर्चर के अनुसार लगभग साढ़े चार बजे विधान सभा भवन के उत्तरी भाग पर एक कांग्रेसी झंडा लहराता हुआ दिखाई दिया। डीआईजी तथा आईजी ने अपनी –अपनी रिर्पोट में लिखा है कि किसी आंदोलनकारी ने किसी तरह विधान सभा की छतपर चढकर कांग्रेस झंडा फहरा दिया था। आज तक यह रहस्य बना हुआ है।

फिर कुछ लोगों ने शंका की कि वह झंडा नहीं है, बल्कि सरकार ने लोगों को छलावा देने के लिए एक कपड़ा लटका दिया है। नतीजा यह हुआ कि नौजवानों की भीड़ क्रुध्द हो गई और लोगों ने दुगुने वेग के साथ नारेबाजी करना शुरू कर दिया। भीड़ मरने –मरने पर उतारू हो गई। कुछ ही क्षणों में घुड़सवार सैन्य पुलिस के घोड़े दौड़ा दिया गए। लेकिन आन्दोलनकारी विचलित नहीं हुए। लोगों ने घुड़सवार पुलिस पर रोड़े –पत्थरों की वर्षा शुरू की। संयोग से रोड़ मरम्मत हेतु सड़क के किनारे पत्थर पड़े हुए थे। उग्र भीड़ ने जमकर पत्थरबाजी की जिसमें एक घुड़सवार बुरी तरह घायल हो गया। स्वंय आईजी पुलिस घायल हो गए , और उन्हें मुख्य दवार की तरफ लौटना पड़ा। जबर्दस्त मुठभेड़ जारी रही। एक तरफ घोड़ों की टाप से स्वतंत्रता सेनानी घायल होते रहे, दूसरी तरफ वे अपने दुश्मनों को रोड़े- पत्थरों से पीटते रहे। कलक्टर, आईजी, डीआईजी तथा एसडीओ ने चिल्ला – चिल्लाकर चेतावनी दी कि अगर आन्दोलनकारी नहीं हटे हो फायरिंग होगी, पर किसी ने इसकी प्रवाह नहीं की।

हर कोई मर मिटने को तैयार था। पटना सचिवालय परिसर में ब्रिटिश सरकार और निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों में भीषण युध्द छिड़ा था। आजादी के जुनून में किशोर विद्यार्थियों का खून खौल रहा था। वे अपनी जान हथेली पर लेकर मृत्यु का तांडव नृत्य कर रहे थे। लाठी और घोड़े की टाप की मार खाकर भीड़ दो कदम पीछे हट जाती और तुरंत वापस आ जाती और रोड़ों,पत्थरों तथा नारियलों से उसका जबाव देती। प्रशासन फायरिंग करने की चेतावनी बार-बार दुहरा था।

परन्तु गोली की प्रवाह न करते हुए राम गोविन्द सिंह तथा जगपति कुमार ने अपनी –अपनी कमीजें खोलकर अपना –अपना सीना तान दिया और कहा, “तुम गोली चलाओ, गोली से हम नहीं डरते”। और यह कहते –कहते दोनों नौजवान आगे बढ़े। तभी कलक्टर ने गोली चलाने का आदेश दिया। 4:57 पर फायरिंग के साथ ही राजेन्द्र सिंह और उमाकांत गिर पड़े, अनेक लोग घायल हुए। एक गोली राम गोविन्द सिंह की छाती को बेदती पार हो गई। प्रत्यक्षदर्शी उनके साथ नगीना सिंह घायल हो गए। गोली उनके पैर में लगी। भीड़ छितरा गई। पर, कुछ ही क्षणों बाद नौजवान फिर आगे आए और इस बार बौखलाहट में बायी ओर के लोगों ने भयंकर पथराव शुरू कर दिया। गोरख सैन्य पुलिस के जवानों ने दुबारा फायर किया जिसमें पांच विद्यार्थी गिर पड़े। कुल तेरह राउंड फायरिंग हुई जिसमें चार लोगों ने वहीं घटना स्थल पर ही अंतिम साँस ली और तीन ने अस्पताल में दम तोड़ा । सरकारी रिर्पोट के अनुसार पच्चीस स्वतंत्रता सेनानी घायल हुए्। पर प्रत्यक्षदर्शियों का कहना ही विशवसनीय लगता है की इस फायरिंग में करीब सौ लोग घायल हुए।