बेज़ुबान पशुओं की लड़ाई

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किशनगंज – ऊंट, जिसे रेगिस्तान का जहाज़  भी कहा  जाता  है और  राजस्थान  आदि जगहों  के आर्थिक  जीवन  के  लिए  अनिवार्य  माना  गया  है, यह  पशु  धीरे-धीरे  लुप्त  होता  जा  रहा  है। इंटरनेशनल  यूनियन  फॉर  कंज़र्वेशन ऑफ नेचर एंड  नेचुरल  रिसोर्सेज  (IUCN) संस्थान  ऊंट  को  हाल ही में  लुप्तप्राय  पशु  का  दर्जा  दे  चुकी  है। अब  प्रश्न  यह  उठता  है  कि  यह  पशु  आखिर लुप्त  कहाँ , कैसे  व  क्यों हो रहा  है?
हाल ही  में  61 ऐसे  ऊंटों  का  झुण्ड  राजस्थान  से  1400 किमी  दूर, बिहार-बांग्लादेश  की  सरहद  पर  किशनगंज  में  पाया  गया। ऊंट  को  राजस्थान  राज्य  का  प्राणी  घोषित  किया गया  है  और  ऊंटों  की  हत्या, तस्करी  और उनका  गैरकानूनी  तरीके  से  स्थलांतर  पर रोक है, कारण  राजस्थान  कैमल  प्रोहिबिशन  ऑफ़   स्लॉटर  एंड  रेगुलेशन  ऑफ़  टेम्पररी  माइग्रेशन  और  एक्सपोर्ट एक्ट, 2015 के  अन्तर्गत  प्रतिबंधित है । किसी  भी  राज्य  की  सीमाओं  से  बाहर  स्थलांतर  करने  के  लिए  वरिष्ठ  सरकारी  अधिकारी  की  अनुमति  लेना  एवं  एक  पंजीकृत  पशुचिकित्सक  से  प्रमाणपत्र  मिलना अनिवार्य  होता  है, जो  यह  निर्धारित  करे  कि  वह  पशु स्थलांतर  करने  हेतु  सम्पूर्णतः  निरोगी  व  स्वस्थ  है । इसके  बावजूद  इन ऊंटों  को  राजस्थान  के सरहद  से  बाहर  इतने  मीलों  दूर  बिना  किसी प्रमाणपत्र  हत्या  करने  के  हेतु से  ले  जाया  गया  था। इस  बार  भले ही  ऊंटों  का  यह  झुण्ड  पकड़ा  गया  है, किन्तु  इस  घटना  से  यह  स्पष्ट होता  है  कि  अतीत  में  ऐसी  कितनी  सारी  अनगिनत  हत्याओं  की घटनाएं  इन  वरिष्ठ  अधिकारियों  के  नाक  के  नीचे  ही  होती होंगी।
यह  लड़ाई  इन  ऊंटों  को  बचाने  के  कार्य  में सक्रीय  रहने वाले  पशु  कल्याण  कार्यकर्ताओं  के  लिए  कितनी  ज्यादा  कठिन  है, यह  तथ्य  किशनगंज  में  बचाये  गए  इन  ऊंटों  के राहत कार्यों  से  स्पष्ट हो  रहा  है (इस  मामले  का  क्रमांक 543/2016 है  और  यह  मामला किशनगंज पुलिस  थाने  में  दर्ज  है)। ध्यान  फाउंडेशन  की  स्वयंसेविका  नीरू  गुप्ता  कहती हैं, “5 दिसम्बर  को  हमने  न्यायालय  से  इन  ऊंटों  को  राजस्थान  के  पशु  आश्रय  में  (अर्थात उनके  प्राकृतिक  स्थल) पर  ले  जाए  जाने  हेतु  अनुमति ली किन्तु, 14 दिसम्बर  को इस  अनुमति पर  रोक  लगवाई गई”।
ध्यान  फाउंडेशन  की  एक  और  स्वयंसेविका  जो  कि  एक  पशुप्रेमी है  और  पेशे  से कलाकार  हैं, जो  इन  ऊंटों  को  बचाने  के  लिए  दिल्ली से  प्रस्थान  कर  राजस्थान  आयी, कहती  हैं  कि, “ऊंटों  को  राजस्थान  ले जाने  की  अनुमति पर  रोक  लगाने  की  सुनवाई करनेवाले  न्यायाधीश  यह  रोक  लगवाने  के  बाद  तुरंत दो  दिन  की  छुट्टी पर  चले गए, जिसके  कारण  हम  अपनी बात न्यायालय  के  सामने  सही  तरीके  से  रख  ही  नहीं  पाएं.” अब  सारे  न्यायालय  सर्दियों  के  कारण  बंद  हैं  और  सीधे  अगले  साल जनवरी में ही खुलेंगे।
ध्यान  फाउंडेशन  इस  मामले  में  इन  ऊंटों  को  सुरक्षित  वातावरण  दिलाने  हेतु  शुरुआत से सक्रीय  रहा  है। इस  कार्य  के  अन्तर्गत  ध्यान  फाउंडेशन  के  स्वयंसेवक  दिन- रात लगातार पुलिस  थानों, न्यायालयों  और  परिवहन  कार्यालयों  के  चक्कर  काट  रहे  हैं। ध्यान फाउंडेशन  की  एक  और  स्वयंसेविका  अंजलि  शर्मा, जो  कि  निताशा  जैनी और  नीरू गुप्ता के  साथ इस  मामले  में कार्य  कर  रही हैं, कहती  हैं  कि, “रेगिस्तान  ही  ऊंटों का असली  व प्राकृतिक  घर  है। इस  मामले  की  सुनवाई  पर  रोक  लगने  के  कारण  जो  देर  हो  रही  है, उसमें  पहले ही  एक  ऊंट  की  मृत्यु  हो  चुकी  है, जिसके  कारण  हम  बाकियों  की  सुरक्षा का कार्य  जल्द  से  जल्द  पूरा  करना  चाहते  हैं। ऊंटों  की  तस्करी व  उनकी  हत्या  तो  पहले ही गुनाह  के  रूप  में घोषित हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट  के  निर्देशानुसार  जब  तक  मामले  पर आखिरी फैसला नहीं सुनाया  जाता  तब  तक   पशुओं  को  पशु आश्रयों  में ही  रखा  जाना चाहिए किन्तु सुप्रीम कोर्ट के  इस  आदेश  के  बावजूद इन ऊंटों  को  बचानेवाले  कार्यकर्ताओं की  बात  को  नजरअंदाज  कर  उन पर  अत्याचार  करनेवाले  गुनहगारों  के  हक़  में सुनवाईयां  हो  रही  हैं।”