5 सितंबर को मनायी जाएगी अनंत चतुदर्शी

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुदर्शी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। संकट से रक्षा करने वाला भगवान अनंत की पूजा पांच सितंबर को सुकर्मा योग में होगी, व्रत कर्ता प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजा गृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मुर्ति अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनंत सूत्र (डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंत सूत्र की षोडशोपचार-विधि से पूजा करें। पूजनोपरांत अनन्त सूत्र को मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-

अनंतसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

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इस दिन भगवान सूर्य का उदय भी चतुदर्शी तिथि में हो रहा है। जिस कारण भगवान अनंत की पूजा विशेष फलदायी है। धनिष्ठा नक्षत्र 12.55 बजे तक है भगवान अनंत की पूजा करने से धन, यश, बुध्दि बढने के साथ भगवत कृपा बनी रहती है। अनंत चतुदर्शी के दिन 11.57 के बाद पूर्णिमा तिथि आ रही है। जो पुरे दिन रहेगी। ऐसे में जातक अपने घर में भगवान नारायण की पूजन एंव भजन- कीर्तन कर सकते हैं।

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अनंत चतुदर्शी की पूरी कथा

एक दिन कौण्डिल्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिल्य ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनंत सूत्र को जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड़ दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया।

उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिल्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनंत भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनंत देवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिल्य मुनि को जब अनंत भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफा में ले जाकर चतुर्भुज अनंत देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनंत सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनंत-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी, और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिल्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनंत-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिल्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनंत-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान अनंत की पूजा करने से संकट से रक्षा होती है। मान्यता है की जब पांडव सारा राज-पात खोकर वनवास का दुःख भोग रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अनंत चतुर्दशी व्रत करने को कहते है।