अन्य पिछड़ा वर्ग के कल्याण को समर्पित रहा संसद का मानसून सत्र

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संसद का मानसून सत्र
विपक्ष के तर्कहीन अवरोध के बावजूद भी कई अर्थों में उपलब्धि भरा रहा। मोदी सरकार
की दृढ़ इच्छाशक्ति एवं जनता के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन में सफलता प्राप्त
करते हुए कई महत्वपूर्ण विधेयक इस सत्र में पास हुए। सबसे महत्वपूर्ण विधेयक अन्य
पिछड़ा वर्ग के हित संरक्षण को लेकर पास हुआ संविधान संशोधन विधेयक रहा।

संविधान निर्माता जब
देश का संविधान बना रहे थे तब यह विषय मुख्य रूप से चर्चा में आया कि अनुसूचित
जाति अैर अनुसूचित जनजाति वर्ग की तो सूची है लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची नहीं
है, इसलिए इनकी सूची बनाने का और इनका सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक उत्थान करने का कार्य हाथ
में लेना है, तो उस समय की सरकार के मुखिया नेहरू ने कहा कि संविधान लागू होने के बाद एक
वर्ष के अन्दर-अन्दर अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया जायेगा और इन सारे विषयों
को उस आयोग की सिफारिश के अनुसार हल किया जायेगा, चाहे योजना सामाजिक
या शैक्षणिक उत्थान करने की हो या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण
विषय हों, उन सभी का निस्तारण इस आयोग द्वारा किया जाएगा।

बाबासाहेब डॉ.
भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पी थे, इस कारण संविधान
निर्माताओं की श्रेणी में वे एक प्रमुख हस्ती के रूप में उभरे थे। डॉ. अम्बेडकर
संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के भी चेयरमैन थे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर को नेहरू
मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बनाया गया, लेकिन सरकार की नीतियों से असंतोष व्यक्त करते
हुए उन्होंने 27 सितम्बर, 1951 को नेहरू मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र दे दिया। नियमानुसार उनको सदन में
अपना स्पष्टीकरण देने का अधिकार था, किन्तु उन्हें ऐसा करने से रोका गया। अतः जब
बाबासाहेब को स्पष्टीकरण नहीं देने दिया गया तो उन्होंने 10 अक्टूबर, 1951 को अपने स्पष्टीकरण का पत्र प्रेस के माध्यम से रिलीज किया। बाबासाहेब द्वारा
इस पत्र में त्यागपत्र देने के चार प्रमुख कारण बताये गये थे, जिनमें एक प्रमुख कारण यह था कि अन्य पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए जो आयोग गठन
का वादा सरकार द्वारा किया गया था, उस आयोग का गठन नहीं किया गया और 1 वर्ष 5 महीने बीत जाने के बाद भी आयोग का गठन नहीं करना उनकी पीड़ा थी। डॉ. अम्बेडकर
ने त्यागपत्र में यह भी उल्लिखित किया है कि न केवल आयोग का गठन किया गया बल्कि
गठन के बारे में सोचा भी नहीं गया। तब से अन्य पिछड़ा वर्ग का मामला चल रहा था।
उसके बाद 1953 में काका कालेलकर आयोग का गठन हुआ, जिसकी रिपोर्ट बाद में आयी। तत्कालीन कांग्रेस
सरकार द्वारा इस आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। उसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार द्वारा, जिसमें जनसंघ भी सम्मिलित था, बी.पी. मण्डल की अध्यक्षता में मण्डल आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने अपनी
रिपोर्ट 1980 में सरकार को सौंपी, किन्तु इस आयेग की सिफारिशों को भी तत्कालीन
कांग्रेस सरकार द्वारा लागू नहीं किया गया। 

मण्डल आयोग की
सिफारिश 1990 में तब लागू हुई जब केंद्र में वीपी सिंह सरकार थी और भाजपा बाहर से समर्थन
दे रही थी। इस प्रकार अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। उसके बाद 1993 में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ, किन्तु संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया। वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री बने तब जाकर इस विषय में गम्भीरता
आयी। 2018 में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया। यहां यह तथ्य भी
उल्लेखनीय है कि जब 2018 में जब लोकसभा द्वारा पारित अन्य पिछड़ा वर्ग
आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का विधेयक राज्यसभा में लाया गया तो चर्चा के दौरान
कांग्रेस के सदस्य दिग्विजय सिंह द्वारा संशोधन प्रस्तुत
किया गया और कहा गया कि आयोग के सदस्यों में मुस्लिम वर्ग को सम्मिलित किया जाये।
इस प्रकार दिग्विजय सिंह द्वारा आयोग को सांप्रदायिक स्वरूप देने का प्रयास किया
गया। इसके बाद इसको पास होने में 6 महीने और लग गए।

वर्तमान में मराठा
आरक्षण आन्दोलन के कारण यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय
द्वारा 2018 में उसकी संवैधानिक वैधता का परीक्षण किया गया। 3-2 के अनुपात में फैसले से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों द्वारा निर्मित
सूची को अवैध कर दिया। अब वर्तमान में मोदी जी के नेतृत्व में संसद ने तुरन्त ही
संविधान का 127वां संशोधन प्रस्तुत किया जो 105वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पारित
किया गया, जिसके द्वारा राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान
करने और उनकी सूची बनाने का अधिकार प्रदान किया गया है। इस व्यवस्था से विभिन्न
पिछड़ी जातियां जो अपने को अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित कराने के लिए आंदोलनरत हैं
तथा जिनके आवेदन काफी समय से लम्बित हैं, उनपर राज्यों द्वारा उचित निर्णय लेने का मार्ग
प्रशस्त होगा। 

देश इस समय भारतीय
स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। देश के माननीय प्रधानमंत्री द्वारा इसे ‘आजादी का
अमृत महोत्सव‘ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। हम 12 मार्च 2021 से आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने
साबरमती आश्रम से इसका आरम्भ किया था, तब से लगातार जनभागीदारी को सुनिश्चित करते हुए
विभिन्न कार्यक्रम किये जा रहे हैं, लेकिन 15 अगस्त 2021 से 15 अगस्त 2022 तक आजादी के अमृत महोत्सव की धूम रहेगी। आजादी
के अमृत महोत्सव में अन्य पिछड़ा वर्ग के हित संरक्षण और संवर्धन का कार्य मोदी
सरकार द्वारा किया गया है जो इस समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
राज्यों द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान सुनिश्चित करने
और सूचीबद्ध करने से उनको सरकारी योजनाओं का लाभ एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण
का लाभ समुचित रूप से मिल सकेगा। आजादी के अमृत महोत्सव में अमृत चखने का लाभ
सच्चे अर्थों में इस समाज को भी मिल सकेगा।

कर्पूरी ठाकुर, राममनोहर लोहिया व अन्य नेताओं द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के सामाजिक व शैक्षणिक
विकास का जो सपना देखा गया था तथा जिसके लिए जीवन भर संघर्ष किया था, आज देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र की
भाजपा नीत राजग सरकार उसको साकार रूप देने का पुनीत कार्य कर रही है।

अर्जुन राम मेघवाल

संसदीय कार्य एवं
संस्कृति राज्य मंत्री,

भारत सरकार

(ये लेखक के अपने विचार हैं)