बिहार के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी की दुविधा

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पूर्वी चंपारण: पूर्वी चंपारण जिला के ढ़ाका अनुमंडल क्षेत्र स्थित परसा गांव का रहने वाला चितरंजन कुमार लॉन बॉल और कराटे के खेल में कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुका है। चितरंजन कुमार एशियन गेम में देश का नाम रौशन करना चाहता है। लेकिन उसके सपने गरीबी की बोझ से दब गई है। क्योंकि उसके पास प्रैक्टिस के लिए समुचित साधन नहीं है। लॉन बॉल कीट्स के अभाव में वह प्रैक्टिस भी नहीं कर पा रहा है।किट खरीदने के पैसे उसके पास नहीं है और उसकी मदद करने को कोई आगे नहीं आ रहा है।जबकि वह स्थानीय जनप्रतिनिधि से भी मिल चुका है।

एक माँ का संघर्ष

चितरंजन की मां ने अपने बेटा के जुनून को देखकर अपने पेट को काटकर किसी तरह उसकी इच्छा को पूरी की। वह अपने बेटा के उपलब्धियों को बताते नहीं थकती है। लेकिन वह अपने पुत्र के खेल की सामग्री को खरीद पाने में सक्षम नहीं है और वह सरकार से आस लगाये बैठी है।

ग्रामीणों का अभिमान चितरंजन

इधर चितरंजन के ग्रामीणों को उसपर अभिमान है और ग्रामीण उसे हर तरह से उसके सहयोग को तैयार हैं। लेकिन चितरंजन के प्रैक्टिस के लिए व्यवस्था कर पाने में ग्रामीण भी असमर्थ हैं।

कई प्रतियोगिताओं में अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया

लॉन बॉल और कराटे में ब्लैक बेल्ट ले चुके चितरंजन ने कई प्रतियोगिताओं में अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उसके पिता दूसरे राज्य में मजदूरी कर परिवार चलाते हैं, लेकिन परिवार की गरीबी भी उसके हिम्मत को नहीं तोड़ पाई। स्कूली स्तर के प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने से उसका हौसला बढ़ता गया और खेलो इंडिया में बिहार का प्रतिनिधित्व कर उसने कांस्य पदक जीता था। चितरंजन को प्रैक्टिस के लिए समुचित सामग्री और कोर्ट नहीं है। जिस कारण वह निराश है।अगर चितरंजन जैसे प्रतिभा को सरकार सुविधा उपलब्ध कराती है,तो चितरंजन निश्चित रुप से अंतरराष्ट्रीय खेलों में राज्य और देश का नाम रौशन कर सकता है।

सरकारी ग्रामीण खेल – कूद प्रोत्साहन योजना की विफलता

बिहार सरकार की ग्रामीण इलाके में लाखो के खर्च से स्टेडियम योजना तो बिफल रहा। अब देखना है कि फिर कोई ग्रामीण इलाके का खिलाड़ी इस कदर अपना स्थान राष्ट्रीय स्तर पर बनाता है तो सरकार या समाजसेवी संस्था खिलाड़ी के मनोबल को कैसे बढ़ा पायेगा या भगवान भरोसे गरीबी का दंश झेलने को छोड़ दिया जाएगा।