शादी के लड्डू

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सुप्रिया सिन्हा

विवाह दो व्यक्तियों के धार्मिक तथा कानूनी रूप से एक साथ रहने के लिए प्रदान सामाजिक मान्यता है. विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है. जिसमें दो लोग अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं. हिन्दू संस्कृति में विवाह कभी न टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक संस्कार है. सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी इस संस्कार का विशेष महत्व है.

मानव समाज में विवाह की संस्था के प्रादुर्भाव के बारे में 19वीं शताब्दी में वेखोफन, मोर्गन तथा मैक्लीनान ने विभिन्न प्रमाणों के आधार पर मानव समाज की आदिम अवस्था में विवाह के बंधन न होने का प्रतिपादन किया था. सब नर-नारियों को कामसुख का अधिकार था. महाभारत में भी पांडु ने अपनी पत्नी कुंती को नियोग के लिए प्रेरित करते हुए कहा है कि पुराने जमाने में विवाह की कोई प्रथा न थी. स्त्री-पुरुषों को यौन संबंध करने की पूरी स्वतंत्रता थी. चीन, यूनान जैसे पश्चिमी देशों के विद्वानों ने भी विवाह की आदिम दशा को कामचार की अवस्था मानी. हालांकि क्रोपाटकिन लाख और व्राफाल्ट ने यह प्रतिपादित किया कि शुरूआती कामचार दशा के बाद पोलीजिनी या अनेक पत्नियां रखने की प्रथा विकसित हुई. और इसके बाद विवाह की वर्तमान प्रथा आई. कहा जाता है, भारत में श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित की.

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 भारत की संसद द्वारा पारित एक कानून है. जिसमें विवाह जैसी पवित्र बंधन को बनाये रखने की चेष्टा की गयी है. किन्तु विवाह, जो पहले एक अटूट बंधन था, इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसा नहीं रह गया है. कुछ विधिविचारकों की नज़र में यह विचार धारा अब शिथिल पड़ गयी है. इस बंधन को विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर विघटित किया जा सकता है. परन्तु समाज में आये दिन ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं कि पति या पत्नी ने एक दूसरे को छोड़ किसी और के साथ चले गये. या फिर तलाक लेकर अकेले ही जीवन बीता रहे.

शादी टूटने के पीछे बहुत सारे पहलू होते हैं. कई बार लोग खुल कर अपने असफल वैवाहिक जीवन की चर्चा करते हैं तो कई बार अंदर ही अंदर घुटन महसूस करते. कई बार लोग आपसी रजामंदी से एक दूसरे से अलग हो जाते. लेकिन बात यहाँ तक आती ही क्यों है? शादी कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल तो है नहीं कि जब मन करे बंधन में बंध गए और जब मन करे तोड़ दे. कई बार इसका गहरा असर मानसिकता पर पड़ता है. जिस समाज के सामने धूमधाम से माँ-बाप शादी कराते हैं उसी समाज के सामने इसे टूटता देख परिवार को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पहले लोग अक्सर बोला करते थे कि कि प्रेम-विवाह असफल होता इसलिए पारंपरिक विवाह करनी चाहिए. यह भी सदियों से बहस का विषय बना हुआ है.

पटना की अर्चना सिंह जिनकी अरेंज मैरिज पारंपरिक ढंग से मात्र 19 साल की उम्र में हुई, और एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही हैं. वह कहती हैं कि लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज, दोनों ही शादियों का मूलमंत्र आपसी समझ है. जैसे लड़की अपने घरवालों को छोड़कर नए घर को अपनाती है, सम्भालती है ठीक उसी तरह लड़कों को भी चाहिए कि वे पत्नी के घरवालों को स्नेह और प्यार दे. साथ ही वह लड़कियों के आत्मनिर्भर बनने की बात पर जोर देती हैं.

तो वहीं दूसरी तरफ समृधि दीक्षित जिन्होंने हाल ही में अपने 12 साल की दोस्ती को शादी के खूबसूरत बंधन में बदला है. वह कहती हैं कि किसी भी रिश्ते में विश्वास होना बहुत जरुरी है. वह और उनके पति एक दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे. उन्होंने ठान लिया था कि शादी करेंगे तो एक दूसरे के साथ ही करेंगे वरना नहीं करेंगे. उनकी शादी अपने आप में एक मिसाल है. वह कहती हैं कि उनका सफर आसान नहीं था. लव मैरिज के लिए उन्हें 2 साल लग गए अपने परिवार वालों को मनाने में. आज भी उन्हें यह किसी सपने से कम नहीं लग रहा कि जिनसे वह प्यार करती, उनके साथ वे अपनी पूरी जिंदगी बिताने वाली हैं.

अमित सिंह (वकील) कहते हैं कि ऐसी कोई बात नहीं है कि केवल लव मैरिज में तलाक की स्थिति पैदा होती, अरेंज में नहीं. वे अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि अरेंज मैरिज में ज्यादातर तलाक के मामले ग्रामीण और अर्ध शहरी इलाकों की लड़कियों का आता है. वे कम शिक्षित होती हैं, वे अपने ससुराल वालों के साथ समायोजित नहीं करना चाहतीं. वे अपने पति के साथ अलग गृहस्थी बसाना चाहती हैं जहाँ वे अकेले बिना किसी रोक-टोक के रहें. ऐसा नहीं होने पर पति-पत्नी के बीच आये दिन कलह होता है और बात तलाक तक आ जाती है. वह यह भी बताते हैं लव मैरिज में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि युवा पीढ़ी प्यार में आकर बिना भविष्य की चिंता किये अपने माँ-बाप के पैसों को देखते हुए शादी तो कर लेते लेकिन उनकी शादी टिक नहीं पाती.

इस बात का निष्कर्ष निकालना तो गलत होगा कि कौन से शादी को उत्तम माना जाए. बात लव मैरिज या अरेंज मैरिज की नहीं है. बात है समझदारी और अनुकूल परिस्थितियों की.