SHARE

छठ महापर्व संपन्न होने के बाद अब घरों में अक्षय नवमी की तैयारी शुरू हो गई है। कार्तिक शुक्ल नवमी को गंगा स्नान और दान का खास महत्व है। मान्यता है कि अक्षय नवमी पर किए गए दान का नाश नहीं होता है। इसलिए लोग गुप्त दान भी करते हैं। सतयुग की शुरुआत इसी दिन हुई थी।

अक्षय नवमी पर गंगा स्नान और दान करने का खास महत्व है। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु दान-पुण्य करेंगे। भतुहा (कोहड़ा) में स्वर्ण, रुपए रखकर भी दान किया जाता है। जमीन दान करने की भी परंपरा रही है। कोहड़ा (जिसे कुष्मांड भी कहते हैं) में बीज काफी मात्रा में होता है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इन बीजों का निर्माण किया है। इसलिए लोग भतुहा में रुपए-पैसे रखकर दान करते हैं। क्योंकि इस दिन किया गया दान अक्षय रहता है।

आंवले के पेड़ के नीचे पूजा

अक्षय नवमी को आंवला नवमी और धातृ नवमी भी कहा जाता है। आंवले के पेड़ के नीचे धातृ देवी व दामोदर (विष्णु भगवान) की पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान से अपने पापों के नाश करने की प्रार्थना की जाएगी। साथ ही पितरों के मोक्ष के लिए आंवले पेड़ की जड़ में दूध की धार दी जाती है। पेड़ से एक सूत्र (धागा) बांधकर लोग प्रदक्षिणा करेंगे।

आंवले के पेड़ों के नीचे भोजन तैयार होता है

अक्षय नवमी पर आंवले के पेड़ों के नीचे भोजन बनाकर खाने-खिलाने की परंपरा है। आंवला पेड़ के नीचे लोग चावल, दाल, सब्जी आदि बनाकर खाते हैं। शहरी क्षेत्र के मुकाबले गांवों में इस नवमी की अधिक धूमधाम रहती है। पिकनिक जैसा माहौल रहता है।