युवा किसान अमरेश ने कैसे किया किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ

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औरंगाबाद – बिहार की जलवायु के अनुसार यहां के किसान अपनी खेतों में धान, गेहूं, दलहन एवं तेलहन की खेती करते हैं। लेकिन ये चारों फसल सभी किसान नही कर पाते क्योंकि अधिकतर खेतों की मिट्टी इसके लिए अनुकूल नही होती। ऐसे में बिहार के कई किसान सिर्फ धान एवं गेहूं की फसल ही कर पाते हैं।मौसम की बेरुखी भी कभी कभी उनकी उम्मीदों पर वज्रपात कर देती है जिससे वे आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाते है।

यही वह परिस्थिति होती है जब किसान महाजन एवं बैंक के कर्ज में डूब जाता है और दुनिया के मोहपाश को त्याग आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा लेता है। किसानों की आर्थिक स्थिति कैसे सुदृढ हो इसका उदाहरण प्रस्तुत किया नबीनगर प्रखंड स्थित कडमरी गांव के युवा किसान अमरेश ने। रोजगार की तलाश में भटकते अमरेश ने पारम्परिक खेती के साथ-साथ औषधीय और सुगंधित फसलों के अंतर्गत मेंथा की खेती की शुरुआत की। इस खेती के माध्यम से कम समय मे ही अमरेश ने न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ किया बल्कि आज उनका शुमार गांव के संपन्न किसानों में हो रहा है। अमरेश बताते हैं कि पारंपरिक खेती में उन्हें मानसून पर निर्भर रहना पड़ता था और कभी कभी प्रकृति की मार के कारण फसल बर्बाद हो जाती थी जिसके कारण वह कर्ज में डूबते चले गए।

आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने पास में ही स्थित एनटीपीसी में ठीकेदारी के काम मे लग गए परन्तु वहां उनका मन नही लगा क्योंकि प्रकृति के साथ रहना और उसके साथ ही कमाने की इनकी इच्छा बचपन से ही थी।प्लांट में ही उनकी मुलाकात सीएसआईआर लखनऊ के एक वैज्ञानिक से हुई और उन्ही से मेंथा की खेती की जानकारी प्राप्त हुई और उन्होंने उसका विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने लखनऊ चले गए।आज उनके द्वारा मेंथा की खेती कर लाखों रुपये अर्जित कर अपने पारिवारिक स्थिति को सुदृढ़ किया।

मेंथा की फसल और उसके उपयोग

अमरेश ने बताया कि एक हेक्टेयर मेंथा की फसल से लगभग 150 किलो तेल प्राप्त हो जाता है, यदि अच्छे से प्रबंधन किया जाय और समय से रोपाई हुई हो तो 200 से 250 किलो तेल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है, मेंथा के तेल के लिए मेंथा की फसल को कटाई करने के बाद तेल निकालने वाले संयंत्र में फसल को ले जाते हैं, फिर कटे हुए मेंथा को कुछ समय के लिए फैला देते हैं, जिससे पत्तियां कुछ पीली पड़ जाती हैं, और वजन भी कम हो जाता है, उसके बाद डिस्टिलेशन संयंत्र में भरकर इसे गर्म करते हैं, इस प्रकार जल वाष्प के साथ तेल बाहर आता है, जहां पहले से ही जल वाष्प को ठंडाकर इक्ठ्ठा कर लिया जाता है और अंत में जल से तेल को अलग कर लेते हैं।

बचा हुआ अवशेष मल्चिंग और खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। साथ ही इसका प्रयोग पेपर और पेपर बोर्ड बनाने में भी करते हैं। पूरी दुनिया में मेंथोल की खपत 9600 मेट्रिक टन है, मेंथोल की पैदावार के मामले में हमारा देश विश्व में पहले स्थान पर है। भारत 3100 मेट्रिक टन,चीन में 2000 मेट्रिक टन,यूरोप में 1900 मेट्रिक टन तथा यूएसए 1800 मेट्रिक टन मेंथोल का उत्पादन प्रतिवर्ष करता है। उन्होंने बताया कि मेंथोल का उपयोग बड़ी मात्रा में दवाईयां, सौंदर्य प्रसाधनों, कन्फेक्शनरी, पेय पदार्थों, सिगरेट, पान मसाला में खुशबू के लिए किया जाता है, साथ ही मेंथा और यूकेलिप्टस के तेल से कई रोग निवारण दवाईयां बनाई जाती हैं, गठिया जैसे रोगों के निवारण हेतु इन दवाओं में किया जाता है और इसके खरीदार वैधनाथ, डाबर,गुरुकुल कांगड़ी,पतंजलि जैसी कम्पनियां करती हैं। अमरेश ने बताया कि मेंथा की खेती के प्रोत्साहन के लिए किसी भी स्तर से उन्हें प्रशासनिक सहयोग प्राप्त नही हुआ है लेकिन उन्हें यह जुनून था कि इस खेती को करके अपने क्षेत्र के किसानों के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करूँ और उसमें मैं सफल हुआ।स्थिति यह है कि कई किसान इसकी खेती के लिए तैयार हैं।

औरंगाबाद के विधायक ने भी की अमरेश की सराहना

अमरेश द्वारा मेंथा की खेती किये जाने की सूचना मिलते ही औरंगाबाद के विधायक आनंद शंकर सिंह अपने समर्थकों के साथ कडमरी गांव पहुंचे और मेंथा की फसल देखकर काफी प्रभावित हुए। उन्होंने इसकी पूरी जानकारी प्राप्त कर अमरेश की सराहना की और उन्हें किसानों का आईकॉन बताया। विधायक ने कहा कि मेंथा की खेती आज के परिवेश की मांग है क्योंकि वैश्विक स्तर पर लोगों का रुझान औषधीय उत्पादों में अधिक हो रहा है इसलिए जरूरत है इसके बहुद्देशीय उपयोग की।मेंथा की खेती से किसी प्रकार का नुकसान नही बल्कि सिर्फ फायदे ही फायदे हैं और इसका उदाहरण अमरेश ने प्रस्तुत किया है। आज सरकारी स्तर पर इसकी खेती के प्रति जागरूकता पैदा कर किसानों को आकर्षित करने की जरूरत है। इससे न तो सिर्फ अपने खेतों के भरपूर उपयोग कर सकते हैं बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।