उस मासूम की तो पहचान भी दफ़न हो जाती !

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गया – क्या उस नन्ही परी को पता था कि उसे किसने लाकर जल समाधि दी ? किसने जन्म दिया और किसने यूं फ़ेंक दिया ? क्या वो किसी के गोद की रौनक थी या थी किसी का सिरदर्द ? या किसी ने उसे उसके माँ-बाप से किया था दूर ? कितने सवाल हैं पर क्या जवाब कभी भी मिलेंगे ?

जिले के वजीरगंज प्रखंड के पूरा हाल्ट के समीप सड़क के किनारे पहाड़ी की तलहटी में एक कुआं में बच्ची की लाश को तैरते देखा गया। इसकी खबर आग की तरह पूरे प्रखंड में फैल गयी। आस-पास के ग्रामीणों ने कुएं से शव को निकालकर दफन कर दिया क्योंकि जो लोग भी आ रहे थे सिर्फ देख कर वापस लौट रहे थे।

आखिर कब तक मासूम का शव कुएं में पड़ा रहता? दफन करने के बाद वज़ीरगंज थाना पुलिस को भी सूचना मिली और घटनास्थल पर पुलिस पहुंची भी। ग्रामीणों ने पूरी बात बताई और वापस पुलिस लौट गई।

पुलिस ने भी बच्ची की पहचान करने की ज़हमत नहीं उठाई। आखिर उठाती भी क्यों, पहचान के लिए प्रक्रिया करनी पड़ती, पोस्टमार्टम के लिए भेजना पड़ता और पुलिस के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही बच्ची की लाश सरदर्द भी बन जाती। शायद इसी सोच की वजह से मासूम की पहचान जमीन में दफन कर दी गयी।

पर तभी कुछ बदला। इससे पहले कि किसी के ज़िगर के टुकड़े की गुमशुदगी हमेशा के लिए रहस्य बन कर रह जाए, गया एसएसपी ने जांच के आदेश दिए और दुबारा पुलिस ने पहुंच कर शव को निकाला और फिर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।

समाज में आज भी है लिंगभेद का नज़रिया और इसमें पुलिस भी नहीं है पीछे, इस घटना ने यही सबक दिया। वो बच्ची अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ सकती और समाज के पास इतनी फुरसत ही नहीं !