मानव के साथ चलिए दूर, बहुत दूर

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पुस्तक समीक्षा

मनीषा प्रकाश

क्या आप जानते हैं कि तुम्हारी सुलु फिल्म वाले मानव कौल बेस्टसेलर किताबें लिखते हैं, नाटक लिखते हैं, नाट्य-निर्देशन करते हैं, तैराक रहे हैं और पेंटिंग भी करते हैं? मुझे इतना कुछ पता नहीं था, इसे आप मेरी कमतर जानकारी समझ सकते हैं. अचानक ट्विटर पर मानव की किताबों के विषय में पता चला. इतफ़ाक है कि मैं मुम्बई उस स्क्रीन अवार्ड को देखने गई थी जिसमें तुम्हारी सुलु को कई पुरस्कार मिले थे. मानव फिल्म की पूरी टीम के साथ मौजूद थे और मैं उन सब के पीछे बैठी थी. उस वक्त बिलकुल नहीं लगा था कि मैं एक लेखक को देख रहीं हूँ. वैसे लेखक को देखना कैसा होता है? आपका पूरा नज़रिया बदल जाता है.

चलिए अब बात करते हैं मानव कौल की चौथी किताब – बहुत दूर, कितना दूर होता है – के विषय में जो एक नया और अलग किस्म का यात्रा-वृत्तान्त लेखन है जिसमें मानव के मई-जून 2019 के बीच यूरोप के अलग-अलग स्थानों पर की गई एकल यात्रा को दर्ज किया गया है. किताब हिन्द युग्म से प्रकाशित है.

ये किताब मेरे लिए एक अलग किस्म का अनुभव था. मुझे ये वैसी किताब नहीं लगी जिसे आप एक रफ़्तार में जल्दी से पढ़ कर ख़त्म कर सकते हैं. हर कुछ दूर पर रुक कर सोचना पड़ता है कि आखिर मानव क्या कहना चाह रहे हैं, उनकी सोच से तार मिलाना पड़ता है. कुछ पंक्तियाँ ऐसी मिलती जाती हैं कि जिनपर थम कर विचार करने का मन हो जाता है.

नई वाली हिन्दी मेरे लिए नई है इसलिए पता नहीं कि इसका नियम-कायदा क्या है. हिन्दी में अंग्रेज़ी के शब्द खटकते हैं पर नई पीढी को शायद ये पसंद आए. हर पाठक इस किताब को अपने चश्मे से देखेगा.

ख़ास बात है कि मानव के इस यात्रा–वृत्तान्त में आप उनके जीवन यात्रा की भी झलक देखेंगे. पेरिस में वॉन गॉग, पिकासो, कामू की तलाश, सार्त्र और सिमोन की कब्र पर मौन, कई म्यूजियम देखना …ये सब आपको लेखक का अपना परिचय भी देंगे. पुस्तक में कई लेखकों का भी जिक्र करते हैं जिनका प्रभाव उनपर पड़ा.

उदासी, झूठ, खोखलापन, पछतावा, डर, अकेलापन और इन भावानाओं के साथ कहानियों में छिपना. खुद कहते हैं मैं पागल हूँ. बताते हैं कि परिवार वाले कहते हैं कि माथा खराब है. राह चलते एक दिन का इश्क भी फरमाते हैं मानव. सहसा उस अंग्रेज़ी कहावत का ख्याल आ जाता है – अ गर्ल इन एवरी पोर्ट. टूटे हुए दिल पीछे छोड़ मानव यात्रा में आगे चलते जाते हैं. एक बार ये लगता है कि कहीं ये सब काल्पनिक तो नहीं है, पात्र का नाम मानव भर है पर ये मानव गढ़ा हुआ है. शक तब और गहरा जाता है जब एनेसी वाले एलेक्स से बड़ी आसानी से झूठ कह देते हैं. किताब में एक जगह कहते भी है – क्योंकि मैं अपने जीवन को भी बतौर एक काल्पनिक कहानी की तरह ही लेता हूँ. अब इस वाक्य के कई मायने हो सकते हैं.

यात्रा कई बार साधारण लगती है पर रास्ते में चमकीले माइलस्टोन हैं जिनपर कुछ ऐसा लिखा है कि आप चौंक जाएं. पर हर यात्री इस यात्रा को अपने नज़रिए से देखेगा. किसी को उब भी हो सकती है, बेचैनी भी या हो सकता है मन किसी यात्रा में बहुत दूर जाने का हो जाए.

जब-जब मानव कॉफ़ी पीते हैं और साथ में croissant खाते हैं तो स्वाद आप अपनी ज़बान पर भी महसूस करेंगे. हर जगह की आवाज जो मानव ने सुनी है, वो आपको भी सुनाई देगी साथ ही बर्फीले पहाड़ों की ठंडक कंपकपी का एहसास दे जाएगी.

अगर आप लेखक हैं या होना चाहते हैं तो आपके लिए भी इस पुस्तक में कुछ न कुछ है. एक लेखक कैसे सोचता है ये मानव कई बार बताते हैं. पूरी यात्रा में वे खुद को लेखक ही बताते हैं और लगातार लिखते रहते हैं.

मानव कहते हैं: “कितना ज़्यादा रोमांस है ये कहने में कि मैं लेखक हूँ. अपने देश में मैं कभी भी इतने आत्मविश्वास से यह नहीं कह पाया”.

पूरी यात्रा मानव एक बच्चे के उत्साह के साथ करते हैं और आखिर में जब यात्रा-वृत्तांत पूरा होता है तो उन्हें ये किसी बच्चे से खिलौना छीनने जैसा लगता है.