लोक कलाकार भिखारी ठाकुर

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बिहार के भोजपुर जनपद में एक ऐसे कलाकार ने जन्म लिया, जिसने अपने गीत एवं नाट्य-नाच कला से तत्कालीन समाज-व्यवस्था को झकझोर दिया। वो और कोई नहीं बल्कि बिहार के सारण जिले में जन्मे जिन्हें भोजपुरी भाषा के शेक्सपीयर नाम से जाना जाता है, और उस महान कलाकार का नाम था भिखारी ठाकुर। उनकी कीर्ति भोजपुर के जनपदों एवं अमराईयों में आज भी गुंजायमान है।

प्रोषितपतिका की विरह व्यथा, अबोध नाबालिग बालिका का पिता की उम्र के पुरुष के साथ विवाह संबंध की प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने सांस्कृतिक युद्ध छेड़ दिया। लोक जीवन को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक अव्यवस्थाओं की ओर स्वरचित गीत-संगीत, नाट्य एवं नाच के माध्यम से जागृत किया। बिहार के अन्य भू-भागों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश एवं बंगाल तक बिहार के गौरव को महिमामण्डित करने का काम किया।

एक साधारण पढ़े-लिखे देहाती दुनिया से इस व्यक्ति ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि आज तक इस क्षेत्र का लोक-जीवन उनकी स्वर लहरी में सराबोर है। वे कला के वरद पुत्र थे। उनका जन्म पुराने सारण जिले के कुतुबपुर गाँव में सन 1887-88 के सांघातिक काल में हुआ था। जिस कुप्रथा को ठाकुर अपने नाच, नाट्य एवं संगीत के माध्यम से निषिद्ध मना था वे स्वयं उसके शिकार हुए थे। दरअसल बचपन में ही उनकी शादी कर दी गयी थी, लगता है उसी कटु अनुभव ने उन्हें इस प्रथा के विरुद्ध समाज को झकझोरने हेतु उत्प्रेरित किया।

भिखारी ठाकुर का अवतरण जिस सांघातिक काल खंड में हुआ था, वह भारतीय जनपदों के लिए विषाद का समय था। 1857 में महासंग्राम को अंग्रेजों द्वारा कुचल दिए जाने के बाद भारतीय समाज दिशाहीन हो गया था। अन्धविश्वास, अशिक्षा, असमानता तथा विकृति से तत्कालीन समाज आक्रान्त था। बेरोजगारी अकाल और निर्धनता से ग्रस्त समाज दिग्भ्रमित और लाचारी की स्थिति में था। इन्हीं परिस्थितियों में भिखारी ठाकुर ने अपनी कला के प्रदर्शन के माध्यम से लोकजीवन में जागृति का संचार करने का प्रयास किया था।

तत्कालीन समाज से जुड़े विषयों पर उनकी कला का प्रदर्शन समाज के लिए मनोरंजन और संतोष का कवच बन गया। इस लोक कलाकार का निधन 10 जुलाई, 1974 को 84 वर्ष की अवस्था में हो गया और उन्हीं के साथ लोक जीवन के चितेरा का अंत हो गया।