दी प्रिंट का बिहार विरोधी दृष्टिकोण : ‘टॉक्सिक बिहारी परिवार’ और ‘श्रवण कुमार बनने का बोझ’

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जानेमाने पत्रकार शेखर गुप्ता की दी प्रिंट ने एक लेख छापा है जिसकी खूब चर्चा हो रही है और इसको लेकर जबरदस्त आक्रोश भी है. इसके विरोध में बिहार के लोग सोशल मीडिया पर खुद को श्रवण कुमार बता तस्वीरें पोस्ट कर रहें हैं और ट्विटर पर #Bihari ट्रेंड कर रहा है.

उस लेख का हेडलाइन (Sushant Singh Rajput and the burden of being a ‘Shravan Kumar’ in toxic Bihari families) ही बिहार को अपमानित करने के लिए काफी है. कोई भी व्यक्ति ये लेख पढ़कर पत्रकार के सोच-विचार पर अफ़सोस कर सकता है. बहुत ही सतही और संकीर्ण मानसिकता के साथ ये लेख लिखा गया है. यह भी समझ आता है कि लिखनेवाली किसी कारणवश बिहार के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित है और बिहार को बहुत कम समझती है.

यहाँ तक तो बात समझ आती है कि पत्रकार रिया चक्रवर्ती के तरफ से आवाज उठाना चाहती हैं पर ये करने के लिए पूरे बिहार राज्य और यहाँ के लोगों को अपमानित करने की जरुरत कैसे आन पड़ी? क्या इसके पीछे भी कोई राजनीति है? यह हम भी मानते हैं कि बिना पुख्ता सबूत के किसी भी महिला को अपमानित और ज़लील करना सही नहीं है और किसी को सज़ा देने के लिए हमारे देश में न्यायिक व्यवस्था है. कानून को हाथ में उठाना कतई सही नहीं.

पत्रकार चाहतीं तो इस लेख को संतुलन के साथ लिख सकती थीं. पर चूँकि ये ओपिनियन है इसलिए इन्होंने कुछ ज्यादा ही छूट ले ली और एक नफ़रत भरे सोच को आगे बढ़ाया. जैसा उन्होंने चित्रांकन किया है बिहार बिलकुल वैसा नहीं है. जैसा वो बता रहीं हैं वैसे कुछ परिवार हैं भी तो उसी ब्रश से पूरे बिहार को पेंट नहीं किया जा सकता.

यह भी समझ आ रहा है कि पत्रकार का विश्वास एकल परिवार में हैं. आज के बिहार में हर दूसरे-तीसरे परिवार में अंतरजातीय विवाह हो रहा है और इसकी स्वीकार्यता बढ़ी है. बिहार सरकार ऐसे विवाह करने वालों को प्रोत्साहन राशि भी देती है ताकि जातीयता ख़त्म हो.

आमतौर पर बिहारी मध्यम वर्ग की ज़िंदगी उनके बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है, जन्म के साथ ही यहाँ अभिभावक को उनके पढ़ने-लिखने की चिंता हो जाती है. यही कारण है कि लोग खेत बेच और महंगे स्टूडेंट लोन लेकर भी बच्चों को पढ़ाते हैं. एक समय यहाँ यूपीएससी, आईआईटी में उत्तीर्ण होने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी. और ये बात बेटे और बेटियों दोनों के लिए सही है. बेटियों को पढ़ाने के लिए भी उतनी ही ललक है. अब ये सोच गाँवों तक पहुँच गई है.

ये बात सही है कि कोई परिवार नहीं चाहता कि उसके घर का बेटा या बेटी बिना अपने पाँव पर खड़े हुए गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के चक्कर में पड़े. पर हमें नहीं लगता कि ये सोच बिहार तक ही सीमीत है. ये किसी भी माँ-बाप की सोच है.

रही बात सुशांत सिंह राजपूत के परिवार की तो जैसा बताया जा रहा है सुशांत की पहले भी महिला मित्र थीं जिनसे उनके परिवार को कोई आपत्ति नहीं थी. हर परिवार अपने बेटे या बेटी को खुशहाल देखना चाहता है.

किसी का भी बेटा अगर गर्लफ्रेंड या अपनी ससुराल पर इतनी ज्यादा राशि खर्च करे तो पहली प्रतिक्रया ऐसी ही होगी. इससे बिहारी होने का कोई लेना-देना नहीं.

रिया-सुशांत मामले की सारी जानकारी जो अब तक प्राप्त हुई है उसको देखते हुए हमें लगता है कि रिया और उनके परिवार को ठोस तरीके से अपनी बातें लोगों के सामने रखनी चाहिए ताकी लोग उनका पक्ष भी जान सकें. रिया अपने वकील के माध्यम से मुम्बई के पत्रकारों के साथ संपर्क में हैं. जिस तरह उन्होंने विडियो  जारी किया कुछ उसी तरह अपने सच को उजागर कर सकती हैं. अभी तक उन्होंने जो कुछ भी साझा किया उससे पुख्ता सबूत नहीं मिल पा रहे. यही बात मुम्बई पुलिस के लिए भी कही जा सकती है. एक मिनट के लिए मान लिया जाए कि सुशांत के परिवार ने मुम्बई पुलिस से लिखित फ़रियाद नहीं कि फिर भी अगर व्हाट्सएप्प पर लिख कर दिया तो क्या उस दिशा में भी जांच नहीं होनी चाहिए थी. फ़िल्म कलाकारों को बुलाकर जो पूछताछ कर रहे थे उसके लिए भी तो किसी ने लिखित नहीं दिया था. फिर किसके शिकायत पर इतने सारे बॉलीवुड की हस्तियों से पूछताछ की गई?

इसके साथ ही मैग्निफिसेंट बिहार लोगों से अपील करता है कि कानून को अपना काम करने दें, रिया चक्रवर्ती की जो भी सच्चाई है वो समय के साथ उजागर हो जाएगी. सोशल मीडिया पर गालियाँ देना और प्रताड़ित करना कतई ठीक नहीं. सुशांत जिस तरह के इंसान थें, वे भी शायद यही चाहते. एक जिम्मेदार नागरिक होते हुए हम किसी को आत्महत्या के लिए नहीं उकसा सकते.

सुशांत सिंह राजपूत के लिए हमारे मन में बहुत प्यार है और उनके परिवार के लिए भी गहरी संवेदना है. परिवार को न्याय जरुर मिले इसके लिए हम सब उनके साथ खड़े हैं.