सामा चकवा: भाई-बहन के प्यार का अनूठा त्योहार

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पटना: उत्तरी बिहार के मिथिलांचल में सामा चकवा त्योहार महत्पपूर्ण माना जाता है। लोक कथाओं, लोक संस्कृतियों और लोक गीतों वाले विविधतापूर्ण देश में भाई-बहन के प्रेम को प्रदर्शित करता सामा चकवा एक ऐसा त्योहार है जिसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत की एक अलग झलक देखने को मिलती है।

वैसे यह त्योहार मुख्यरूप से उत्तरी बिहार के मिथिलांचल का पर्व है जहां गीत नाद के बिना कोई त्योहार पूरा नहीं होता. मिथिला की माटी में ऐसे ही गीत संगीत के माहौल में घर-घर में सामा खेले चलली.. बहनी संग सहेली.. हो जुग जुग जिय हो.. भैया जिय हो..जैसे लोक गीतों की गूंज हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी से सात दिन तक सुनाई पड़ती है।

गोवा की राज्यपाल और मूलत: बिहार से संबद्ध प्रख्यात साहित्यकार मृदुला सिन्हा का कहना है कि सामा चकवा मिथिला का एक अनोखा त्योहार है जिसमें भाई बहन के संबंध की व्याख्या है। इसमें मायका और ससुराल के बीच के रिश्तों का बखान है। हालांकि इसे त्योहार नहीं खेल कहना उपयुक्त होगा।

उन्होंने कहा कि गांव की महिलाएं और लड़कियां कुछ मूर्तियां बनाकर अपने डाला में रखती हैं और उसमें दीया जलाती हैं। फिर वे अपनी-अपनी टोली में एकत्रित होकर मूर्तियों को लेकर खेत में चली जाती हैं और वहीं बैठकर गीत गाते हुए कुछ खेल खेलती हैं। भाई के प्रति अनुराग और विश्वास प्रकट करने का यह अनोखा तरीका है।

मृदुला सिन्हा ने कहा कि यह खेल सात दिन चलता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात नदी या तालाब किनारे जाकर फिर खेल खेला जाता है और सामा (बहन) चकवा (भाई) और सभी मूर्तियों को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। उस दिन बहनों के साथ भाई भी वहां होता है। मैं भी यह खेल खेलती थी और गीत गाती थी। व्यस्त होने के बावजूद आज भी सामा का गीत गाती हूं।