दीदारगंज यक्षिणी की शताब्दी वर्ष

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विश्व विख्यात दीदारगंज यक्षी की प्रतिमा की प्राप्ति एक संयोग ही है। यह प्रतिमा गंगा नदी के किनारे पूर्वी पटना के दीदारगंज स्थित धोबी घाट से उदघाटित हुई, जो की धोबी घाट पर उल्टी अवस्था में मिट्टी–कीचड़ में दबी हुई थी और इसका आधा हिस्सा ऊपर था ।

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एक दिन एक सांप दिखाई दिया और वह सांप प्रतिमा के समीप बिल में छिप गया। वहां पर उपस्थित लोगों ने सांप को मारने के लिए वहां पर खोदना प्रारंभ किया जिससे यह प्रतिमा सामने आयी और वह तिथि था 18 अक्तूबर 1917।

स्थानीय पुलिस स्टेशन के रिपोर्ट, दिनांक 20 अक्तूबर 1917 के अनुसार एक सांप गंगा नदी के किनारे एक बिल में घुसते देखा गया। यह स्थान था दीदारगंज कदमरसूल, नासिरपुर ताजपुर, हिस्सा खुर्द मालसलामी, थाना पटना सिटी में स्थित है। वहां के स्थनीय लोगों द्वारा बिल की खुदाई करने पर आदमकद मूर्ति प्राप्त हुई, जो पत्थर से बनी थी। इस रिपोर्ट के अनुसार इस मूर्ति के उदघाटन का श्रेय काजी मुहम्मद अफजल उर्फ गुलाम रसूल, पिता– मौलवी काजी सईद मुहम्मद अजीमुल उर्फ गुलाम मोहीउद्दीन को दिया गया । हिन्दुओं ने इसे लाकर दीदार गंज गांव में रखा और उसके बाद दिनांक 17.12.1917 को इसे पटना संग्रहालय लाया गया । अभी यह प्रतिमा वर्तमान में पटना संग्रहालय, पटना में प्रदर्शित है । इसका ट्रेजर ट्रोव एक्ट,1978 के प्रावधानों के अनुसार तत्कालीन पटना कमिश्नर ई.एच.एस. वाल्स के पत्र संख्या-261, दिनांक 20.11.1917 के अालोक में अधिग्रहण किया गया।

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स्थिति आकार

इसकी कुल ऊंचाई 6’91/2” है (1’71/2” आधार और 5’2” प्रतिमा की ऊंचाई)। यह प्रतिमा चुनार (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) के बलुआ पत्थर से बनाई गयी है । प्रतिमा की नाक और बायां हाथ यहां आने से पूर्व ही टूटा हुआ था । यह प्रतिमा चहुमुख दर्शनीय है और इसमें दर्पण की तरह चमक हैं। अप्रतीम एवं अतुलनीय यह भारतीय सन्दर्भ में नारी सौन्दर्य के मानदंडो को जीवंत करता है। इसे पूर्ण नारी के सौन्दर्य के प्रतीक रूप में पतली कमर क्रमशः पतले होते पैर तथा बेलनाकार बांह के साथ मनमोहक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। दाएं कंधे पर चंवर के भर के कारण यह आगे की ओर झुकी हुई है। लेकिन चंवर पकड़ने के ढंग से इसकी सेवा के प्रति मानसिक प्रतिबधता एवं शारीरिक दृढ़ता भी परिलक्षित हो रही है । उल्लेखनीय है कि यहां चंवर सेवा का प्रतीक है, जो नारी का एक नैसर्गिक गुण है। मातृत्व के बिना नारी को अधूरा माना जाता है। इस प्रतिमा में मातृत्व का प्रदर्शन पूर्ण विकसित वक्ष स्थल एवं दोनों वक्षो के आकार में अंतर के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। इसका बायां वक्ष दायें की अपेक्षा थोड़ा छोटा है । बायीं ओर हृदय होने के कारण स्द्धोजात के बायें वक्ष में अपेक्षाकृत कम दूध होने से इसका आकार दायें से कम होता है और यह एक चिकित्सीय सत्य है। शिल्पकार ने प्रतिमा के कपोल को हल्का उधर्व उभार देकर चेहरे पर स्मित मुस्कान का अंकन किया है, जो विश्व प्रसिद्ध मोनालिसा की मुस्कान से कहीं आगे हैं । मोनालिसा की मुस्कान अगूढ़ तथा रहस्यात्मक है और यह देखने वाले पर व्यंग करती प्रतीत होती है, जबकि दीदारगंज यक्षी प्रतिमा की मुस्कान संतुलित और मोहक है। साथ ही इस मुस्कान का अर्थ देखने वाले की दृष्टि में सन्निहित हैं। यदि दर्शक इसे माता के रूप में देख रहा है तो, मुस्कान मातृत्व पूर्ण है और यदि कोई इसे अपनी स्त्री या प्रेमिका के रूप में देख रहा है तो, मुस्कान तदनुरूप है।

पूर्व आख्यान

किसी भी मानवेतर अथवा अद्भत कृति को पारलौकिक या दैवी कहना मानवीय मानसिकता है परन्तु कुछ वैसी मानवेतर अथवा सामान्य मानव गुणों से अतिरेक प्रतिमाएं, जिन्हें देवताओ के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, उन्हें यक्ष अथवा यक्षी कहा गया है । विश्व की सारी प्रारंभिक कलाएं धर्म एवं पारलोकिक विश्वास के द्वारा निर्देशिक हुई और भारत में तो यह युग- युगांतर तक चलता रहा। फलस्वरूप भारतीय कला अभिव्यक्तियों में पश्चिमी स्वाभाविकता नहीं है, वरन यहां प्रतीकात्मक भावों की प्रधानता है। सम्भवतः इन्हीं कारणों से कुषाण शासकों के उनके सिक्कों पर अंकन और स्वप्रतिमा निर्माण के कारण उन्हें देवपुत्र कहा गया और कालांतर में इन्हीं परिस्थितियों और पूर्वाग्रह से प्रभावित होकर इस प्रकार की मानवेतर प्रतिमाओ की विद्वानों ने यक्ष अथवा यक्षी की संज्ञा दी। दीदारगंज चांवरधारिणी प्रतिमा को यक्षी की संज्ञा देनेवाले प्रमुख विद्वान् है– काशी प्रसाद जायसवाल, वासुदेवशरण अग्रवाल, रामप्रसाद चंदा तथा जे. एन. बनर्जी। वासुदेव शरण अग्रवाल ने इस प्रतिमा को यक्ष–यक्षी सम्प्रदाय, जो बुद्ध एवं परवर्ती काल में काफी लोकप्रिय था, से सम्बन्ध करते हुए इसे यक्षी कहा। लगभग इसी प्रकार के विचार राम प्रसाद चंद ने भी व्यक्त किये। जे.एन. बनर्जी ने इस प्रकार के सभी त्रि–आयामी प्रतिमाओं को एक समूह में रखते हुए सभी प्रतिमाओं को प्रथम शदी ईसा पूर्व के लोक सम्प्रदाय से जोड़ते हुए इन्हें सामूहिक रूप से यक्ष–यक्षी कहा। बनर्जी ने अपने कथन के पक्ष मंन जैन एवं बौद्ध साहित्य के उदाहरणों को आधार बनाया। निहार रंजन रे ने अपनी पुस्तक – “मौर्य एवं मौर्योत्तर कला “ में इस प्रतिमा का द्वीतीय शती ईसा पूर्व काल निर्धारित किया और साथ ही काल निर्धारण को अप्रासंगिक भी बताया। जहां तक प्रतिमा के सौन्दर्य एवं मानवाभिव्यक्ति का प्रश्न है, इसे परवर्ती एवं तत्कालीन कला में अंकित होने वाले यक्षी प्रतिमाओं का पूर्व उदाहरण बताया। परन्तु श्री रे इस प्रतिमा की अभिजात्य प्रस्तुत को नकार नहीं पायें और इसे लोक कला अथवा सम्प्रदाय से जोड़ने में असमर्थता व्यक्त की।

कला इतिहासकार स्वराज प्रकाश गुप्त ने इसे “यक्षी” कहा, परन्तु इसमें भरहुत एवं सांची की प्रतिमाओं के विपरीत नगरीय अभिजात्य गुणों की झलक पाई। एस.पी. गुप्त न इस प्रतिमा के काल निर्धारित के क्रम में इसकी तुलना पूर्ववर्ती एवं परवर्ती यक्ष यक्षी प्रतिमाओं से करते हुए एक सूत्र निर्धारित किया, जो इस प्रकार है :- अशोक स्तम्भ – स्वतंत्र खड़ी यक्ष यक्षी प्रतिमाएं – भरहुत सांची के तोरण द्वार पर अंकित यक्ष यक्षी प्रतिमाएं तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक साथ साथ चली और द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में इसका साहचर्य समाप्त हो गया। पाटलीपुत्र ‘यक्ष –यक्षी’ प्रतिमाओं के केंद्र के रूप में स्थापित हुआ और उदाहरण स्वरूप दीदारगंज यक्षी प्रतिमा के साथ साथ पटना से प्राप्त यक्ष यक्षी प्रतिमाओं को उधृत किया जा सकता है। एस. के. सरस्वती ने अब तक प्राप्त यक्ष–यक्षी प्रतिमाओं का तुलनात्मक अध्यन प्रस्तुत करते हुए इस प्रतिमा की तुलना मथुरा के द्वरा स्तम्भों पर अंकित यक्षी प्रतिमाओं से किया और इसे यक्षी कहते हुए इसकी तिथि प्रथम शती इस्वी निर्धारित किया। कला इतिहासकार प्रमोद चंद ने इसकी तिथि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व निर्धारित करते हुए इसे चांवर धारिणी देवी की संज्ञा डी, इसे यक्षी खा और अवधारणा तथा मूल भाव के स्तर पर मातृ देवी बताया। प्रख्यात काल इतिहासकार आनन्द कुमार स्वामी ने अपनी पुस्तक “यक्ष” में इस प्रतिमा का उल्लेख तक नहीं किया है। वे इस प्रतिमा को यक्षिणी कहने का साहस नहीं कर पाए, बल्कि ‘चांवर धारिणी ‘ कहा श्री शिव मूर्ति ने इसे ‘चांवर धारिणी’ ही कहा है। प्रशांत कुमार जयसवाल ने इस प्रतिमा को अशोक कालीन बताते हुए तत्कालीन सामाजिक संस्कृति परिप्रेक्ष्य में इस प्रतिमा को स्त्री रत्न की संज्ञा दी। श्री जयसवाल ने बताया कि इस प्रतिमा का उद्देश्य समाज अनुशासन और भारतीय स्त्री का उच्च आदर्शों को स्थापित करने के संदेश के प्रसारण का प्रतीक बताया इस सन्दर्भ में श्री जायसवाल ने अशोक द्वारा नियुक्त स्त्रीध्यक्ष महामात्य की भी चर्चा की । कार्ल खंड्लावाला तथा देवांगना देसाई ने भी इसे अशोक कालीन बताते हुए स्त्री रत्न के पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत किये है। राय गोविन्द चन्द्र एवं माधुरी अग्रवाल ने इस प्रतिमा की पहचान ‘प्रारंभिक लक्ष्मी प्रतिमा’ के रूप में की है और अपने तर्क का आधार परवर्ती काल में विष्णु के साथ अंकित चावर धारिणी लक्ष्मी की प्रतिमा को बनाया ।

काल निर्धारण

यदपि विद्वानों में इस प्रतिमा के काल पर मतैक्य नहीं है परन्तु देश के विभिन्न स्थलों से प्राप्त यक्ष–यक्षी प्रतिमाओं के साथ और अन्य मौर्यकालीन कृतियों के साथ इसकी तुलना कर इसका काल निर्धारण किया जा सकता है। साथ ही इसके लिए इसे मौर्य कालीन समाजिक, संस्कृति पृष्ठभूमि में देखना होगा। विद्वानों ने विभिन्न स्थलों से प्राप्त इस प्रकार की अन्य कलाकृति को मोटे तौर पर मौर्य–शुंग काल में रखा है। तदुपरांत मौर्य एवं शुंग काल की कलाओं को अलग करने के लिए कलाकृतियों की द्वि-आयामी कलाकृतियों को शुंग कालीन बताया है। साथ ही विद्वान इस प्रतिमा को मौर्य कालीन घोषित करने का आधार इस पर मौजूद ओपदार चमक को भी बताया, जो मौर्य कालीन प्रस्तर कलाकृतियों की विशिष्ठता है। इसी परिप्रेक्ष्य में दीदारगंज यक्षी प्रतिमा का काल तीसरी शदी ईसा पूर्व (मौर्य काल) में निर्धारित किया जा सकता है और विद्वानों का एक बड़े समूह इसे मौर्य कालीन ही मानते है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक परिप्रेक्षय में इस प्रतिमा विवेचन से इसकी तिथि तथा प्रासंगिकता पर प्रकाश पड़ता है। चांवर धारिणी के समान स्त्री आकृति समुद्रगुप्त के अश्वमेध प्रकार के सिक्के, जग्गेय पेट (आंध्र प्रदेश) से प्राप्त चक्रवर्ती के सप्त रतनी पैनल और पाल कालीन विष्णु प्रतिमा के साथ चांवर धारिणी लक्ष्मी प्रतिमा के रूप में दृष्टि गोचर होती है नाम अथवा संज्ञा के विवाद में न पड़ते हुए, इस प्रतिमा को “आदर्श नारी प्रतीक”कहना अधिक समीचीन प्रतीत होता है । दीदारगंज यक्षी की प्रतिमा में भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारी सौन्दर्य के प्रतिमानों को जीवंत किया गया है। कहा ही जा चुका है कि यहाँ चांवर सेवा का प्रतीक है, जो आदर्श नारी का एक गुण है। प्रतिमा के चांवर के पकड़ने के ढंग से इसकी सेवा के प्रतीक है, जो आदर्श नारी का गुण है। प्रतिमा के चांवर के पकड़ने के ढंग से इसकी सेवा के प्रति प्रतिबधता स्पष्ट होती है। आदर्श नारी को चक्रवर्ती के ‘सप्त-रत्नों ‘ के अंतर्गत ब्राहमण साहित्य के अनुसार भार्या “ एवं बौद्ध साहित्य के अनुसार स्त्रिरत्न के रूप में मान्यता दी गयी है । ब्राह्मण साहित्य के अंतर्गत सर्वप्रथम वृहद देवता नामक ग्रन्थ में चक्रवर्ती के सप्त रत्नों में ‘भार्या’ का उल्लेख आता है वृहद देवता की तिथि चौथी शताब्दी ईसा पूर्व निर्धारित की जाती है बौद्ध साहित्य में चक्रवर्ती सुत्त तथा महासुदस्सन सुत्त में चक्रवर्ती के सप्तरत्नों का वर्णन है, जिसमे ‘भर्या’ के स्थान स्त्रीरत्न की चर्चा है। दोनों सुत्तों की तिथि भिओ चौथी शताब्दी ईसा पूर्व निर्धारित की जाती है। भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम मौर्य शासक अशोक को चक्रवर्ती सम्राट के रूप में मान्यता मिली, यह सम्राट अशोक की कृति, अभिलेखों एवं उनके वैश्विक अपील से भी स्थापित होता है। सम्राट अशोक ने नारी उत्थान तथा समाज में नारी की प्रतिष्ठा हेतु स्त्रीध्य्क्ष महामात्य की नियुक्ति की । इसका उद्देश्य समाज में नारी की प्रतिष्ठा को अक्षुण रखना एवं नारी के लिए नैतिक मूल्यों एवं आदर्शों का प्रतिस्थापन भी था ।

महासुदन सुत्त में ‘स्त्रीरत्न’ के प्रकटन स्पष्ट करते हुए लिखा है कि स्त्रीरत्न के रूप में आदर्श नारी को “न तो अधिक युवा और न वृद्ध होना चाहिए, उसे न तो बहुत अधिक लम्बा और न ही नाटा होना चाहिए, उसे न तो स्थूल न ही कृशकाय होना चाहिए “ ये सारे गुण इस प्रतिमा में देखे जा सकते है। अतः जब “आदर्श नारी प्रतीक” प्रतिमा निर्माण की आवश्यकता पड़ी तो स्वाभाविक रूप से उसके लिए साहित्यक आधार बोद्ध साहित्य में उपलब्ध स्त्रीरत्न का वृहद प्रारूप सामने आया और उन्होंने उसी के अनुरूप प्रतिमा का निर्माण किया चुकीं सेवा आदर्श नारी का अभिन्न गुण हैं, अतः इसे दिखाने के उद्देश्य से शिल्पकार ने इसे चांवर धारण किए हुए दिखाया। मातृत्व प्रदर्शन के लिए शिल्पकार ने स्तनों के आकार में भिन्नता का आश्रय लिया इस प्रतिमा के बाएं स्तन का आकर दाएं के तुलना में छोटा है। आदर्श नारी प्रतीक यह प्रतिमा परवर्ती काल में इस प्रकार के अंकन का आधार बना। समुन्द्रगुप्त के अश्वमेध प्रकार के सिक्के के पृष्ठ भाग पर सम्राज्ञी को चंवर धारण किए अंकित किया है। ब्राहमण साहित्य में किसी शासक द्वारा अश्वमेध यज्ञ के सिक्के के पृष्ठ भाग पर सम्राज्ञी ‘भार्या’ के रूप में चावर धारण किए अंकित की गयी है। इसी प्रकार विष्णु जब ब्रह्मांड के पालक के रूप में पूर्ण राजकीय वेश–भूषा में शंख, चक्र, गदा पद्द के साथ किरीट मुकुट धारण किए हुए चक्रवर्ती के रूप में अंकित होते हैं, तो वहां लक्ष्मी उनके साथ स्त्रीरत्न के रूप में चांवर धारण किए हुए अंकित की गयी है। इस प्रकार यह प्रतिमा अपने अतुलनीय सौन्दर्य के साथ आदर्श नारी प्रतीक के रूप में और वैश्विक अपील के कारण विश्व प्रसिद्ध है, साथ ही भारतीय कला की एक अनुपम कृति के रूप में स्थापित है ।