क्यों कहे जाते हैं अपने समय के कालजयी कवि ‘दिनकर’ !

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पटना – राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को कौन नहीं जानता है? आज ही के दिन उनका निधन 1974 को हुआ था. बिहार के बेगूसराय में जन्मे दिनकर राष्ट्रकवि के साथ-साथ जनकवि भी थे. आज वो तो हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उनकी लेखनी हमारे बीच है जिससे वो सदा अमर रहेंगे.

दिनकर अपने समय के कालजयी कवि माने जाते हैं. दिनकर ने रंग बिरंगी तूलिकाओं से अपने काव्यों की रचना की है. एक ओर दिनकर ओजपूर्ण, क्रांतिकारी एवं विप्लवी काव्यों के सृजन में राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका यौवन हुंकार भरता है. भूखे बच्चों के लिए व्योम से दूध लुटकर लाना चाहते हैं तो दुसरी ओर श्रृंगार के रस में सराबोर होकर कामिनी के वक्ष के कुसुम कुञ्ज पर मृत्यु की राह में जाने वालों को भी पलभर के लिए श्रान्ति दूर करार अनिर्वचनीय आनंद से साक्षात्कार कराते हैं.

वास्तव में दिनकर का कविरूप द्वंदों से भरा है. एक ओर दिनकर के मन में गांधी के करुणा-प्रेम समन्वित प्रशांत विराट व्यक्तित्व के प्रति भरपूर श्रद्धा है. हिंसा से अहिंसा को अच्छा अवश्य मानता है. परन्तु वे समय की पुकार ललकार से अनजान नहीं रह पाते. उनका कवि ह्रदय विद्रोह कर उठता है. वे अतीत की ओर देखते हुए अवध से राम की वृन्दावन से घनश्याम की और कपिलवस्तु से बुद्ध की खबर अवश्य पूछते हैं.

इस बिहार की माटी के सपूत की काव्य-प्रतिभा से राष्ट्र का कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति अनजान नहीं है. इनके कवि-जीवन के सभी पहलुओं को अगर लिपिबद्ध किया जाय तो दिनकर स्वयं महाकाव्यों के महाकाव्य बन जाएंगे. दिनकर ही बिहार के एकमात्र ऐसे सपूत हुए जिन्हें अन्य कतिपय उपाधि एवं सम्मानों के साथ-साथ 1973 में काव्य संग्रह ‘उर्वशी’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया.

दिनकर के जीवन-वृत एवं उनके द्वारा रचित ‘संस्कृत के चार अध्याय’ की प्रस्तावना, जिन्हें पं.जवाहर लाल नेहरु ने लिखा है के अवलोकन मात्र से ‘दिनकर’ की प्रतिभा और व्यक्तित्व का ज्ञान सहज ही हो जाता है.

डॉ. कामेश्वर शर्मा ने “दिग्भ्रमित राष्ट्रकवि” में लिखा है कि ‘यों तो भारत के उन अमर शहीदों की प्रशस्ति में, जिन्होंने हँसते-हँसते, ‘भारत माता की जय’ कहते हुए फांसी का फंदा गले से लगाया था – गीत लिखने वाले अनेक कवि मिलेंगे, परन्तु उन अंगार के पुतलों की दुर्द्धर्ष देशभक्ति, मार्मिक भावुकता, उबलते हुए जोश और उफनती हुई रवानी का सच्चा प्रतिनिधित्व करने वाले सम्पूर्ण उत्तरी भारत में दो ही कवि हुए – नजरुल इस्लाम और दिनकर.