डिप्रेशन, आॅब्सेशन या सिंड्रोम ग्रसित हैं, लालू और शरद- निखिल मंडल

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पटना जनता दल (यू0) के प्रदेश प्रवक्ता निखिल मंडल ने कहा कि शरद यादव को उम्र अब इतनी हो गई है, उन्हें स्वास्थ्य लाभ करना चाहिए, और ज्यादा मानसिक तनाव नहीं लेना चाहिए। मैं उनके बेहतर स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। एक सम्मानित बुजुर्ग होने के नाते शरद यादव से गुजारिश है, अब बिहार को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कृपया इस्तेमाल न करें और मधेपुरा की जनता का तो कम से कम भावनात्मक शोषण करना बंद कर दें। बिहार ने हर उस नेता का सम्मान किया है जो विचार की राजनीति के नायक रहे हैं। लेकिन जिन ऐसे लोगों ने बिहार की धरती पर मिले अवसर की बुनियाद पर ठेकेदारी करनी शुरू की है उनकी राजनीतिक दुकान यहीं की जनता ने बंद कराने में देर भी नहीं की है। बिहार ने उनके बुरे दिन में सहारा देकर उन्हें नेता बनाये रखा लेकिन उन्होंने जिनको नेता बनाया वो कौन लोग हैं और कहाँ हैं? अब शरद यादव को समझ लेना चाहिए कि बिहार और मधेपुरा की जनता ने उनपर बहुत एहसान किया है, तो अब बख्स दें। अगर शरद यादव यह समझते हैं कि मधेपुरा में घर बना लेने से वो बिहार की राजनीति की ठेकेदारी भी कर लेंगे तो यह असंभव है।

शरद यादव से एक बुजुर्ग होने के नाते सहानुभूति है, इस उम्र में अक्सर लोगों को अपने बेटे और परिवार को सेटेल करने की चिंता सताने लगती है। ये वही ‘‘डिप्रेशन, आॅब्सेशन्स या सिंड्रोम’’ग्रसित हैं। जिससे लालू यादव भी ग्रसित हैं। इस आधार पर कह सकते है कि शरद यादव भी ‘‘लालूरोग’’ से पीड़ित हो चुके हैं। शरद याद्व को यह रोग कितना भयानक रूप से लग चूका है कि वे लालू यादव के हाथों अपनी उपेक्षा, बेईज्जती और अपमान सब भूलकर सिर्फ नाम के लिए समाजवाद का नाम जप रहे हैं। लेकिन यह भी एक कड़वा सत्य है, कि हकीकत में भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक हो गए हैं। शरद यादव आजतक अपनी राजनीति उत्तरप्रदेश और बिहार में घूमकर यहाँ की राजनीतिक प्रतिभाओं के कीमत और उनके खून-पसीने की कमाई पर की है। अगर उन्हें अपनी राजनीति हैसियत पर इतना ही गुमान है तो फिर मध्यप्रदेश की जमीन पर जाकर राजनीति क्यों नहीं करते? जबलपुर से जाकर आगामी लोकसभा का चुनाव लड़कर दिखा दें। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते हुए बिहार के बाहर उन्होंने पार्टी का एक-डेढ़ दशकों में कितना विस्तार दिया, बताएं? बिहार के बाहर अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में कितने विधायक-सांसद जितवा कर लाये, इसका हिसाब दें?

शरद यादव को दूसरों की जमीन पर और दूसरों के कंधे पर कूद कर राजनीति करने की आदत हो गयी है, जिसके उन्होंने चौतरफा सिर्फ एक वैचारिक आभामंडल और आडम्बर बनाकर जनता को बरगलाने का काम किया है। लोहिया, जेपी और बी.पी. मंडल की विरासत क्लेम करने के लिए शरद यादव को दो बातें स्पष्ट करनी होंगी। पहला कि वो परिवारवादी नहीं है और दूसरा कि वो भ्रष्टाचारियों के साथ नहीं हैं। लेकिन इन दोनों मामले में शरद यादव का मुखौटा धीरे-धीरे जनता के सामने उतरने लगा है।