विदेशी महिला लिलियन सम ने वेस्टेज मटेरियल से बोधगया में बनाया अनोखा भवन

989
0
SHARE

गया – इंग्लैंड की महिला लिलियन सम जब पहली बार भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया पहुँची तो महाबोधि मंदिर में साधना के लिए जाने के क्रम में वर्ष 2009 में यह देखा कि यहाँ काफी गंदगी है लोग सड़कों पर ही कूड़े कचरे को फेंक देते है इससे वह काफी प्रभावित हुई। इसी के बाद से अमेरिकन तकनीक को अपनाया। वह बोधगया में लोगो से कूड़े-कचरे के ढेर पर पड़े वेस्टेज मटेरियल को चुन-चुन कर इक्कठा करवाया इसमे बोधगया के ही राकेश कुमार ने भरपूर सहयोग किया। वर्ष 2009 से वेस्टेज मटेरियल को रिसाइकल कर प्रयोग में लाने का काम शुरू कर दिया था।

अक्सर लोग पुराने सामान को बेकार समझ कर, पुराने कपड़े, प्लास्टिक और पुराने फर्नीचर को फेंक देते है जबकि इनका पुनः प्रयोग किया जा सकता है। आज पूरे देश मे प्रदूषण और जल संकट की समस्या सिर पर मंडरा रही है इस पर वैज्ञानिक शोध भी कर रहे है। यहाँ सबसे ज्यादा प्रयोग प्लास्टिक का हमलोग करते है और फिर उसे कूड़े पर फेंक देते है जिसे डिकम्पोज होने में 450 साल का समय लग जाता है यानी लंबे समय तक सड़ता नही है। इसी वेस्टेज मटेरियल को रिसाइकल कर बोधगया में मातृभूमि इको लर्निंग सेंटर बनाया गया है। यह सेंटर का भवन पूरी तरह इको फ्रेंडली है। इसकी दीवारों में बेकार प्लास्टिक के कचरे और प्लास्टिक की बोतलों का प्रयोग किया गया है। बेकार बाँस के टुकड़े और सीसे की बोतलों का प्रयोग कर पूरी भवन का निर्माण किया गया है।

इसमें नया यह भी है भवन में जो शौचालय बनाई गई है वह वाटर लेस है मतलब शौचं के बाद इसमे पानी नही डालना होता है बल्कि शौचं के बाद लकड़ी का या धान का भूसा डालना होता है जिससे कुछ दिनों के बाद वह खाद के रूप में कृषि कार्य के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इससे पहले बंगाल के दुर्गापुर में डेमो के रूप में पहली बार शौचालय बनवाया गया था। 9 साल कड़ी मेहनत के बाद आज इको फ्रेंडली भवन बन कर तैयार हुआ है। बताया कि भारत सरकार और राज्य सरकार भी बढ़ते प्रदूषण को रोकने की दिशा में कई कार्य कर रहे है तो उन्हें भी इस प्रकार के वेस्टेज मटेरियल से बने भवन को बढ़ावा देना चाहिए ताकि लोग इसे अपनाएं।