आखिर यह गाँव क्यों बन रहा नक्सलियों का सॉफ्ट टारगेट?

348
0
SHARE

गया – बिहार में विकास के सपने दिखाने वाले सरकार चाहे किसी की भी हो लेकिन सच यह है कि यहाँ के ग्रामीण अब सपने भी नहीं देखते हैं। सरकार के चेहरे भी बदले अगर नहीं कुछ बदला है तो यहाँ की तस्वीर। एक ऐसा गाँव जहाँ जनप्रतिनिधि सिर्फ वोट मांगने आते हैं तो नक्सली पार्टी को मजबूत करने के लिए युवक मांगने आते है और ग्रामीण माँगते हैं विकास। लाल इलाके में नक्सलियों ने हर घर से माँगा है 1 युवक, ग्रामीण हैं भयभीत। कभी यहाँ नक्सलियो का हुआ करता था बेस कैंप। बेस कैंप तो हट गया लेकिन नक्सली गाँव आना नहीं छोड़े हैं। 

गया जिला मुख्यालय से 90 km दूर इमामगंज प्रखंड का लूटीटांड गाँव जहां माओवादियों ने अधिकार दिलाने के लिए और पार्टी को मजबूत करने के लिए गॉव से ग्रामीण मांग बैठे है। यह इलाका नक्सलियों का लाल इलाका के रूप में चिन्हित है। यहां माओवादी अपनी समानांतर सरकार चलाती है। इमामगंज से 8 km दूर यह गाँव लूटीटाँड कई पहाड़ो के ऊपर बसा है। यहां तक पहुंचने के लिए पैदल चलना पड़ता है और कोई रास्ता ही नही है। करीब 40 घरों की बस्ती है। सरकारी योजनाओं की बात करे तो गाँव में एक सरकारी स्कूल भी है जो महीने में 10 दिन हीं खुलता है। आने-जाने का कोई साधन नहीं है न पीने के पानी के लिए कोई सुविधा। 1 हीं चापाकल से पूरा गाँव के लोग पानी पीते हैं। बिजली के खंभे गड़े हैं लेकिन बिजली के तार नही हैं। खेती में मक्का और बाजरा, पशुपालन ही मुख्य पूँजी है।

यहां के ग्रामीण बताते हैं कि पहले यहां नक्सलियों का कैम्प हुआ करता था लेकिन आस पास में पुलिस की कैम्प के बाद नक्सल गतिविधि कम हुई है जब कभी माओवादी संगठन का दस्ता गॉव में आता है तो उसे खाना खिलाना पड़ता है। नक्सलियों ने ग्रामीणों से कहा कि ग्रामीणों को हम अधिकार दिलाएंगे इसके लिए पार्टी को और मजबूत करने की जरूरत है और उसके लिए आप लोगो को हमारे साथ आना होगा अपने-अपने घरों से युवकों को पार्टी में शामिल करवाईये। लेकिन ग्रामीणों ने अपनी लाचारी और बेबसी से समझौता नहीं कर नक्सलियों के साथ नही जाने का इरादा बनाया है।

ग्रामीणों ने बताया कि जब पहले नक्सली गाँव में आते थे तो महिलाओं को छोड़ कर गाँव के पूरे मर्द और बच्चे भाग जाते थे कि कहीं उन्हें अपने साथ न लेकर चला जाय इस बात का डर लगता था। यहां के जनप्रतिनिधि भी चुनाव के वक़्त वोट मांगने सिर्फ आते हैं उसके बाद गाँव का सुध लेने वाला कोई नही है, भय का आलम यह है कि ग्रामीण किसी से शिकायत भी नही करना चाहते हैं।

बच्चे प्रतिदिन अपने स्कुल के खुलने का इंतजार और पढ़ने की ललक संजोए स्कुल जाते हैं लेकिन स्कुल में ताला जड़ा रहता है। महीने में आधे से ज्यादा दिन स्कुल बंद ही रहता है। इस संबंध में इमामगंज डीएसपी सह प्रशिक्षु आईपीएस सुशील कुमार ने बताया कि हमें ऐसी कोई जानकारी नही है और न ही किसी ग्रामीण ने कोई शिकायत की है। हम अपने स्तर से पूरे मामले की जाँच करवा लेते हैं उसके बाद जो भी कानूनी कार्रवाई है वो होगी अगर सुरक्षा देने की बात आती है तो आगे जाँच की जाएगी।

बता दें कि इन इलाकों में जहां विकास की योजनाएं कोसो दूर है वैसे क्षेत्रो में ग्रामीणों को दिग्भ्रमित कर नक्सली अपने पार्टी में शामिल करते है और उन्हें अपने अधिकार दिलाने की बात करते है। न हॉस्पिटल, न शिक्षा, न सड़क, न बिजली ऐसे गाँव नक्सलियों का सॉफ्ट टारगेट होता है।