बेबाक और बुलन्द आवाज में गीताश्री ने रखी कलम श्रृंखला में अपनी बात

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कलम श्रृंखला के 22वें कार्यक्रम में आज पटना पहुंची जानीमानी लेखिका और पत्रकार गीताश्री। आज के कार्यक्रम में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘डाउनलोड होते हैं सपने’ पर रंगकर्मी जयप्रकाश से बातचीत की। कार्यक्रम का आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन और नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स ने किया था।

पटना: इतनी बेबाकी से बहुत कम कथाकार अपनी बात रखते हैं जैसे गीताश्री ने आज रखा। उनकी बातों को आप या तो पसन्द कर सकते हैं या नापसन्द पर गीताश्री बड़ी इमानदारी और खुलेपन से अपने विचार रखती हैं, कुछ ऐसी बातें भी जो आमतौर पर स्त्रियां कहने में हिचकेंगी। पितृसत्तात्मक समाज से उनकी लड़ाई कितनी कठोर है ये उनकी बातों से साफ ज़ाहिर होता है। ये बात और है कि कई बार आप ये महसूस करेंगे कि कहीं इतनी उत्तेज़ना बेमतलब तो नहीं क्यूंकि जिस तरह समाज दिनोंदिन बिखर रहा है, हमें जोड़ने वाली शक्तियों की ज्यादा जरुरत है, तोड़ने वाले की नहीं। गीता कह सकती हैं कि समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी स्त्री और पुरुष दोनों ही पर है। पर स्त्रियां निर्माता होती हैं, विध्वंशक नहीं। इस तरह की कई बातें मन में कौंधती है जब गीताश्री बड़ी ही दृढ़तापूर्वक और आत्मविश्वास के साथ अपनी बातें रखती हैं। जहां तक समाज की गंदगी को उलीच कर बाहर लाने की उनकी कोशिश है, उसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए पर क्या स्त्रियों को ये भी ख्याल नहीं रखना चाहिए कि वह गंदगी उनके ही देह में ना लिपट जाए। स्त्रियों को उनके हक मिले यह कोशिश हर स्त्री करती है पर उस हक में क्या उन्हें ताड़ी पीकर नाले में गिरने की आज़ादी भी चाहिए ? ऐसे कई सवाल है जो मन में आते हैं।

बड़ी ही स्पष्टता से वे अपनी राय रखती हैं और कहती हैं कि स्त्रियों को लड़ाई तब तक लड़नी होगी जब तक ये समाज उन्हें गुलाम समझना बन्द ना कर दें और स्त्री को देह तक ही सीमीत करना न छोड़ दे। एक तरफ जहां उन्होंने मराईटल रेप पर अपनी आवाज़ बुलन्द की तो दूसरी तरफ उन्होंने स्त्रियों के कानूनी अधिकारों का भी जिक्र किया। साथ ही इस बात पर जोर दिया कि स्त्री को अपना जीवन अपनी इच्छा अनुसार जीने का पूरा हक मिलना चाहिए।

अपनी कहानी ‘कोन्हारा घाट’ के एक हिस्से का पाठ करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस कहानी की पात्र विधवा फुआ समाज द्वारा मंदिर तक सीमीत कर देने का विरोध करती है और धन-दौलत लूटा कर भी अपनी आज़ादी तलाशती है।

उसी तरह कई कहानियों में अपने पात्रों के संघर्ष और उनके निर्णयों के मार्फत उनकी चुनौतियों का जिक्र किया ये बताते हुए कि ये सभी स्त्रियां समाज का ही अंग हैं।

गीताश्री ने ये बात साफ की कि उनकी लड़ाई पुरुष वर्ग से नहीं है बल्कि पितृसत्तात्मक समाज के सामंती विचारधारा से है, स्त्रियों को किसी तय दायरे में बांधने से है, नैतिकता का बोझ उन पर लादने से है। बिना किसी हिचक के उन्होंने कहा कि वे घोर अनैतिक हैं और ये कहने में उन्हें कोई गुरेज़ नहीं।

इस दौरान उन्होंने एक स्त्री होने के नाते शुरुआती दौर के लेखन में आई परेशानियों का भी जिक्र किया कि कैसे उन्हें हर स्टेज पर खुद को सिद्ध करना पड़ा। हांलाकि जब वे स्त्रियों की आज़ादी की बातें करती हैं तो कई बातें अनछुई रह जाती हैं। मसलन वे स्त्री के पत्नी और प्रेयसी के किरदार पर तो बहुत कुछ कहती हैं पर स्त्री के माँ होने और उससे संबंधित समाज मे उसकी स्थिति का जिक्र नहीं करती। एक सवाल जो मन में रह जाता है कि क्या एक माँ के लिए भी उस आज़ादी का कोई मतलब है या स्त्री जब माँ होती है तो उसके लिए बाकी सब बातें अर्थहीन हो जाती हैं। मन में आया कि गीताश्री से ये सवाल पूछा जाना चाहिए पर जब उनकी पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर नज़र पड़ी तब हिम्मत नहीं हुई। जवाब वहीं तो था।

गीताश्री का परिचय मूलत: बिहार के वैशाली जिले की गीताश्री की प्रमुख कृतियां हैं प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियां, स्वप्न, साजिश और स्त्री (कहानी संग्रह), औरत की बोली, स्त्री आकांक्षा के मानचित्र (स्त्री विमर्श), सपनों की मंडी (आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर आधारित शोध)।

गीताश्री को वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयन्का, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त् है। साहित्य के लिए इला त्रिवेणी सम्मान-2013, सृजनगाथा अंतराष्ट्रीय सम्मान, भारतेंदु हरिश्चन्द्र सम्मान, साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए बिहार गौरव सम्मान – 2015। राष्ट्रीय स्तर के पांच मीडिया फेलोशिप और उसके तहत विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक विषयों पर गहन शोध् भी उन्होंने किया है।

उन्होंने कई कृतियों का संपादन भी किया है जिनमें नागपाश में स्त्री (स्त्री विमर्श), कल के कलमकार (बाल कथा), स्त्री को पुकारते हैं स्वप्न, कथा रंगपूर्वी (कहानी संग्रह), हिंदी सिनेमा: दुनिया से अलग दुनिया (सिनेमा), तेईस लेखिकाएं और राजेन्द्र यादव (व्यक्तित्व)।

गीताश्री का विवाह अजित अंजुम से हुआ है जो एक जानेमाने मीडियाकर्मी हैं.