सरोजिनी नायडू से शुरू हुआ बिहार आकर सियासत में किस्मत चमकाने का सिलसिला

528
0
SHARE

पटना – सियासत में बिहार आकर किस्मत आजमाने का सिलसिला सरोजिनी नायडू से शुरू होता है. आजादी से पहले 1946 में संविधान सभा के लिए उन्हें बिहार से ही सदस्य चुना गया था. हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी बाद में यूपी की राज्यपाल बनीं. हैदराबाद में ही जन्मे प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता जेबी कृपलानी वर्ष 1912 में मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में प्रोफेसर बनकर आए तो दोबारा वापस नहीं गए. 1953 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से भागलपुर से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे. एक बार सीतामढ़ी से भी चुने गए. हालांकि बाद में पार्टी से इस्तीफ़ा देकर निर्दलीय हो गए. जार्ज फर्नांडिस से पहले मुंबई के मीनू मसानी भी संयुक्त बिहार में 1957 में रांची से निर्दलीय लड़कर सांसद बने थे. 1943 में वह मुंबई के महापौर भी बने थे.

जातीय आधार पर चुनाव के लिए बदनाम बिहार की सियासत ने जार्ज फर्नांडिस के आलावा भी दूसरे प्रदेशों के कई अन्य नेताओं को सहारा दिया है. सरोजिनी नायडू, जेबी कृपलानी, मीनू मसानी, मधु लिमये, अशोक मेहता, मो.यूनुस सलीम, चंद्रशेखर से लेकर वर्तमान में शरद यादव सरीखे कई नेता बिहार की सियासी जमीन पर खड़े होकर सदन में लोकतंत्र की आवाज बुलंद कर चुके हैं. इन्हें जन्मभूमि से ज्यादा कर्मभूमि में शोहरत मिली.

मंगलोर में जन्मे और मुंबई में सितासी उभार पाने के बाद पहली बार जार्ज जब बिहार आए तो यहीं के होकर रह गए. जबलपुर से पहली बार सांसद बने शरद यादव भी जार्ज के नक्शेकदम पर हैं. मध्य प्रदेश से एक बार आए तो लौटकर नहीं गए. जार्ज बिहार से सात बार तो शरद चार बार लोकसभा की दूरी तय कर चुके हैं.

समाजवादी नेता मधु लिमये की सियासत की कहानी बिहार के बिना पूरी नहीं हो सकती है. जार्ज की तरह वह भी महाराष्ट्र से ही बिहार आए थे. सादगी और वैचारिक पैमाने के बड़े नेताओं में शुमार लिमये मुंगेर और बांका संसदीय सीटों से कुल चार बार 1964 से 1979 तक लगातार लोकसभा जाते रहे. बलिया से बार-बार जीत रहे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के लिए भी बुद्ध की धरती शुभ साबित हुई. 1991 में वह महाराजगंज से लोकसभा पहुंचे तो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गए.