मिथिलांचल का पवित्र पर्व जुड़-शीतल

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आधुनिकता के इस दौर में भी मिथिलांचल के लोग अपनी परंपरा का बखूबी निर्वाह करते हैं। खास बात यह है कि उन परंपराओं के पीछे भी कई खूबसूरत उद्देश्य छिपे रहते हैं जिससे आम जन मानस का जीवन जुड़ा हुआ है। उनकी भलाई निहित रहती है। मिथिलांचल सहित पूरे बिहार में मनाया जाने वाला प्रकृति पर्व जुड़ शीतल प्रमुख त्योहार में से एक है, जो आज मनाया जाता है। जिसे पूरे बिहार प्रदेश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के साथ मिथिला में नया साल शुरू हो जाता है।

हालांकि, पर्व मनाने की प्रथा सभी क्षेत्रों में अलग-अलग है। मिथिला में जुड़ शीतल के बहाने घर में बड़े बुजुर्ग, माता-पिता सवेरे-सवेरे बच्चे के सिर पर ठंडा पानी डालते हैं। इसके अलावा महिलाएं, बच्चियां के द्वारा जीव- जंतु, पेड़- पौधों, सड़क-पगडंडी की भी सिंचाई की जाती है। वहीं गृहिणिया सूर्योदय से पहले घर में स्वादिष्ट व्यंजन बनाती है और वही बासी भोजन समूह के साथ खाया जाता है।

जानकारों के अनुसार बासी भोजन खाने से लीवर संबंधी बीमारी कम होती है। इस पर्व की महत्ता ग्रीष्म की तपिश व पानी की महत्ता से जुड़ी हुई है। दरअसल बैसाख मास में अत्यधिक गर्मी पड़ने से जीव जंतु, पेड़-पौधे में पानी की मात्रा कम हो जाती है, इसके मद्देनजर इस पर्व की अपनी महत्ता है, ताकि हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे। वहीं अत्यधिक गर्मी से अगलगी की घटना में बढ़ोतरी हो जाती है, तो उस घटना की रोकथाम के लिए भी पूरे धरातल को पानी से सींच कर ठंढक रखने की परंपरा है, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। वहीं पुरुषों द्वारा शिकार करने की भी परंपरा रही है।