पटना कलेक्ट्रेट कभी डच व्यापारियों का था गोदाम

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पटना – बिहार में 17वीं सदी में कारोबार के लिए आए डचों की निशानियाँ आज भी बिहार में है. पटना से लेकर छपरा तक डच व्यापारियों के गोदाम, उनके द्वारा बनाये गए शानदार वास्तुकला वाले भवन, कब्रिस्तान ऐसे हैं, जिसे संरक्षित कर यूरोपियन टूरिस्ट को लुभाया जा सकता है. डच व्यापारी आम तौर पर मसालों, कपड़ों, कच्चे रेशम, शीशा, चावल और अफीम का व्यापार भारत से करते थे. बिहार में वे अफीम, शोरा और सूती कपड़े का व्यापार करते थे. इसके लिए उन्होंने पूरे बिहार में सेंटर बना कर रखा था. इस पूरे सर्किट का अध्ययन और उनका संरक्षण कर यूरोपियन टूरिस्ट को बिहार भ्रमण के लिए आकर्षित किया जा सकता है. इसके लिए आवश्यकता है पटना से लेकर छपरा तक बिखरे अतीत को एकत्र करने का.

एकीकृत बंगाल में बना था बड़ा व्यापार केंद्र

इतिहासकारों के मुताबिक भारत में ‘डच ईस्ट इंडिया कंपनी’ की स्थापना 1602 में हुई थी. डचों का पुर्तगालियों से संघर्ष हुआ और धीरे-धीरे उन्होंने भारत के सारे मसाला उत्पादन के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. डचों ने गुजरात में कोरोमंडल समुद्र तट, बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अपनी व्यापारिक कोठियां खोली. डच लोग आम तौर पर मसालों, नीम, कच्चे रेशम, शीशा, चावल व अफीम का व्यापार भारत से करते थे.

पटना कलेक्ट्रेट और पटना कॉलेज की मुख्य प्रशासनिक इमारत है धरोहर

पटना कलेक्ट्रेट, पटना कॉलेज की मुख्य प्रशासनिक इमारत और गुलजारबाग इलाके में स्थित अफीम के गोदाम के निशान शहर में नीदरलैंड के इतिहास की आखिरी निशानियाँ हैं. पटना अफीम के व्यापार के प्रमुख केन्द्रों में से एक था और डचों ने गंगा के किनारे कारखाने और गोदाम बनाये थे. इसके साथ ही छपरा-जलालपुर एनएच-101 पर स्थित छपरा शहर के लगभग पांच किमी उत्तर में करिंग में डच कब्रिस्तान भी पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व रखता है. ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, यह जगह 1770 तक डच के नियंत्रण में थी.