युवक का आत्म-बलिदान

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नमक आन्दोलन के साथ, बिहार में चौकीदारी टैक्स का विरोध, नशाबंदी और स्वदेशी आन्दोलन का काम भी किया जाता जाता था. 26 जनवरी 1930 को लाहौर में रावी नदी के किनारे कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना ही अपना लक्ष्य निर्धारित किया था. सभी ने इसकी प्राप्ति के लिए शपथ ली थी. इसलिए तब से प्रत्येक 26 जनवरी को यह शपथ दोहराई जाती थी. 1931 की जनवरी की 26 तारीख जैसे-जैसे पास आने लगी, तो कांग्रेस की ओर से स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए कार्यक्रम की तैयारियां जोर-शोर से की जाने लगी.

4 जनवरी 1931 को गांधीजी गिरफ्तार कर लिए गये. सरकार की ओर से सभी जगह सभा-जुलूस आदि पर रोक लगा दी गयी. जनता द्वारा इस आदेश का विरोध किया जाने लगा. सभाएं होने लगीं और जुलूस निकाले जाने लगे. सभाओं और जुलूसों को भंग करने के लिए पुलिस लाठी-प्रहार करती, पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कांग्रेस समिति के कार्यालयों और आश्रमों पर सरकार कब्जा कर लेती. सदाकत आश्रम पर भी आये दिन छापा मारा जाता और लोग गिरफ्तार होते रहते.

26 जनवरी को कई जगह गोलियां चलीं. मोतिहारी के जिला समिति के कार्यालय के सामने वाले मैदान में एक विशाल सभा हुई. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा गोली चलाई गयी, जिससे कई आदमी मारे गए. लेकिन फिर भी लोग डटे रहे. अंत में गोली चलाना बंद करना पड़ा. लोगों ने रात में लिट्टी खाई और रात-भर वहीं टिके रहे. इस हृदय विदारक घटना के संबंध में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद लिखते हैं कि ” एक युवक ने मरते समय कहा कि मैं स्वराज्य के लिए मर रहा हूँ और लोकमान्य तिलक के पास पहुंचकर संदेश कहूँगा.”

दूसरे दिन सवेरे मुंगेर जिले के तारापुर और बेगूसराय में भी बहुत से लोग गोली के शिकार हुए. तारापुर की घटना के बारे में अनुग्रह बाबू लिखते हैं कि अखिल भारतीय सत्याग्रह संग्राम समिति की ओर से 15 फरवरी को सरकारी इमारतों और थानों पर राष्ट्रीय झंडा फहराने का निर्देश था. उसी निर्देश के अनुसार तारापुर थाने की इमारत पर भी झंडा फहराने का प्रयास किया गया. थाने के ठीक सामने उस दिन हाट लगी थी. सत्याग्रह का दृश्य देखने वालों की भी अच्छी खासी भीड़ जमा थी. स्वयंसेवकों ने थाने के अहाते में ज्योंहीं घुसने की कोशिश की कि पुलिस ने लाठी चला दी. भगदड़ मच गयी, शायद एकाध पत्थर भी जहाँ-तहां फेंके गए.

इसपर पुलिस ने गोलियां चला दीं और लोगों को भून डाला. कोई 12 आदमी मारे गए और 100 के लगभग घायल हुए. बारी साहब ने सुरेश्वर पाठक की सहायता से शीघ्र वहां पहुंचकर गोलीकांड की स्वयं जांच की ओर वहां से पटना आकर उसका सच्चा विवरण बदरी बाबू से लिखवाकर पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया. इस काम में बारी साहब ने अपूर्व साहस और मुस्तैदी दिखाई.

अनुग्रह बाबू ने बेगूसराय की घटना की रिपोर्ट ‘सर्चलाईट’ में छपवा दी. कौंसिल के सदस्यों ने इस रिपोर्ट पर गवर्नर का ध्यान आकृष्ट किया. गवर्नर की एग्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य सिएट ने बेगूसराय जाकर जाकर स्वयं स्थलीय जांच की. उन्होंने पाया कि वहां के अवर प्रमंडल पदाधिकारी और पुलिस डिप्टी सुपरिटेंडेंट इसके लिए जवाबदेह थे. परिणामस्वरूप उनकी वहां से बदली कर दी गयी.