अदालतों का बहिष्कार

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पटना – सरकारी उपाधियों और खिताबों को छोड़ना, सरकारी शिक्षा-संस्थाओं, कौंसिल और सरकारी अदालतों का बहिष्कार करना, 1920 में चलाए गए असहयोग आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य थे।

अंग्रेज सरकार के समर्थकों को सरकार राय साहब, खां साहब, राय बहादुर, खान बहादुर, राजाधिराज, महाराजाधिराज आदि उपाधियां देकर अपनी ओर मिलाए रखती थी। इस प्रकार अंग्रेज सरकार ने हर शहर व हर जिले में खास ढंग के लोगों की एक जमात खड़ी कर ली थी। गांधीजी ने इन उपाधियों को गुलामी का प्रतीक और कलंक का टीका बताकर लोगों को उन्हें छोड़ देने की सलाह दी।

गांधीजी को विश्वास था कि अंग्रेजी सरकार को पंगु बनाने के लिए सरकारी शिक्षा-संस्थाओं का बहिष्कार करना आवश्यक है, क्योंकि ऐसा करने से सरकारी काम-काज ठप्प हो जाएगा। गांधीजी ने लोगों से कहा कि न वे स्वयं सरकारी-संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण करें और न अपने बाल-बच्चों को ही शिक्षा पाने के लिए वहां भेजें।

अंग्रेज सरकार 1919 में प्रशासन संबंधी सुधार द्वारा प्रत्येक प्रान्त में कौंसिल बनाना चाहती थी। 1914-18 के विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उत्तरदायी सरकार बनाने का जो आश्वासन दिया था, उससे वे मुकर गए। इसलिए गांधीजी ने कहा कि हम इस नए कानून के अंतर्गत बनी कौंसिल में नहीं जायेंगे और न ही उनसे किसी प्रकार का लाभ लेंगे।

गांधीजी यह भली-भांति समझते थे कि कोई भी सरकार तभी चल पाती है, जब लोग उसे मानने लग जाते हैं। इसलिए उन्होंने सरकारी अदालतों को नाकाम करने का आह्वान करते हुए कहा कि हम सरकारी अदालतों में नहीं जायेंगे और अपने झगड़ों का निपटारा स्वयं ही करेंगे। उन्हें विश्वास था कि इसी प्रकार यदि सरकारी कर्मचारी भी अपने त्याग-पत्र देकर अलग हो जायें, तो फिर सरकार अपने आप नाकाम हो जायेगी।

अंग्रेज अफसरों ने असहयोग आंदोलन को विफल करने के लिए बिहार सरकार के मंत्री हैलेट के द्वारा एक आदेश निकाला कि म्युनिसिपेलिटी और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड सरकार के ही अंग हैं। अतः इनके सदस्य और कर्मचारी असहयोग आंदोलन में भाग नहीं ले सकते। इससे लोगों में और भी रोष पैदा हो गया।

अपना विरोध प्रकट करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बड़े भाई महेंद्र प्रसाद ने अपनी ‘राय साहब’ की उपाधि वापस कर दी। वह छपरा म्युनिसिपैलिटी में वाईस चेयरमैन थे और आनरेरी मजिस्ट्रेट भी थे। मजिस्ट्रेट के पद से अपना त्यागपत्र देते समय उन्होंने स्पष्ट कर दिया क्योंकि वह जनता द्वारा निर्वाचित होने के कारण वाईस चेयरमैन हैं, इसलिए उस पद से नहीं हटेंगे। महेंद्र प्रसाद के इस तरह के पत्र से अंग्रेज सरकार अवाक रह गई।