चरमपोश की मजार पर दूर-दूर से अकीदतमंद आकर अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं

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पटना – बिहारशरीफ के अम्बेर शेखाना मुहल्ला में हजरत मखूदम सैयद सुल्तान अहदम चरमपोश के मजार पर दूर-दूर से अकीदतमंद आकर अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं. हजरत मखूदम चरमपोश का वफात (इंतकाल) लगभग 700 साल पहले हुई थी. उनका जन्म जमींदार परिवार में हुआ था, लेकिन बाद के वर्षों में वह दुनिया के सुख को छोड़कर रहा-ए-फकीरी अपना ली थी.

वे ईरान के शहर हमदान के रहने वाले थे. वे कम उम्र में ही अपने घर छोड़कर निकल गये और तिब्बत पहुँच गये. वहां उनकी मुलाकात एक जादूगर से हो गयी. जादूगर हजरत अहमद चरमपोश को चुनौती दे रहा था. इस बात से नाराज हजरत चरमपोश ने लोगों से कहा कि आपलोग एक गड्ढा खुदवाए और हम दोनों को उसमें दफन कर दें. लेकिन शर्त है कि उस गड्ढे को 12 साल से पहले कोई न खोलें. दोनों ने शर्त मान ली. कहते हैं कि 12 साल के बाद जब गड्ढा खोला गया तो जादूगर की केवल हड्डियाँ मिली, जबकि हजरत चरमपोश सही सलामत निकले.

मजा के सज्जादानशी नैय्यर शोहरवर्दी के अनुसार हजरत चरमपोश मखदूम जहाँ हजरत शेख शर्फुद्दीन अहमद याहिया मनेरी से पहले बिहारशरीफ आये थे. उनकी इंतकाल उनसे 50 साल पहले हुई थी. उनके जाने की नमाज मखदुमे जहां ने पढाई थी. उन्होंने बताया कि हजरत चरमपोश बहुत जलाली (गुसैल) बुजुर्ग थे. इनके जलाल (गुस्सा) का यह हाल था कि अगर इनके मजार के ऊपर से कोई चिड़िया भी पार होना चाहती तो वह जलकर गिर जाती. मखदुमे जहां ने उनसे गुजारिश की कि वे ऐसा न करें. वरना लोग आपके मजार पर फातिहा पढ़ने से डरेंगे. तब से लेकर आज तक फिर किसी को भी कभी कोई तकलीफ नहीं हुई.

आज हाल यह है कि प्रत्येक दिन सैकड़ों लोग उनके मजार के पास जाते हैं तथा अपनी बीमारियों से निजात पाकर लौटते हैं. उनके मजार के पास समय व्यतीत करने मात्र से रोगों से निजात मिलती है. यहाँ प्रतिवर्ष 20 दिसंबर को दो दिवसीय उर्स-ए-पाक का आयोजन किया जाता है. उर्स में दूर-दूर से लोग आते हैं और अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं.