आध्यात्म और वास्तुकला का मिश्रित नमूना ‘महाबोधि मंदिर’

1097
0
SHARE

पटना – विश्वस्तरीय विरासत के रूप में सम्मान पा रहा बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर आध्यात्म और वास्तुकला का मिश्रित और नायाब नमूना है. शरद ऋतु में बोधगया धर्मावलम्बियों की आस्था के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं. खासकर विश्वशांति के निमित पवित्र बोधिवृक्ष या मंदिर परिसर में आयोजित पूजा स्थल. यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर की मान्यता दे दी है. महाबोधि मंदिर उसी स्थान पर निर्मित है, जहाँ गौतम बुद्ध ने ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी में ज्ञान की प्राप्ति की.

पूजा आयोजन स्थल को फूलों से सजाया जाता है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर देशी-विदेशी फूलों से आकर्षक तोरण द्वार बनाया जाता है. पूजा स्थल पर न सिर्फ पूजा के नेतृत्वकर्ता का आसन सुसज्जित कर रखा जाता है, बल्कि देवी-देवताओं को ‘तोरमा’ समर्पित किया जाता है, जिसे मैदा, मक्खन से स्तूप आकार देकर फूल-फल के साथ पूजा आयोजन स्थल पर रखा जाता है.

महाबोधि बिहार की बनावट सम्राट अशोक के द्वारा स्थापित स्तूप की तरह की है. स्तूपनुमा इस मन्दिर में पद्मासन में भगवान बुद्ध की बड़ी सी मूर्ति पर्यटकों के दर्शन के लिए खास होते हैं. महाबोधि की दीवारें भी पर्यटकों को खासा लुभाती हैं. चारों ओर नक्काशीदार रेलिंग बोध गया में प्राप्त सबसे पुराना अवशेष है. इस विहार परिसर में ही बने पार्क में बौद्ध भिक्षुओं को ध्यान और साधना मग्न देखना भी अपने आप में पुण्य का कार्य माना जाता है. हालांकि इस पार्क में आम लोगों का प्रवेश वर्जित है.

महाबोधि विहार का दर्शन करने बोध गया जाने वाले पर्यटकों के लिए आस-पास में कई और दर्शनीय स्थल हैं. महाबोधि के पश्चिम में बोधगया का सबसे पुराना तिब्बती मठ है. इसके करीब ही थाई मठ स्थित है. इस मठ की छत सोने से कलई की गयी है. इसकी स्थापना थाईलैंड के राजपरिवार ने बौद्ध की स्थापना के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में किया था. इन्डोसन-निप्पन-जापानी मंदिर भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. यहीं पास में स्थित भूटानी मठ की नक्काशी देखते बनती है.