‘मनियार मठान’ था मनेरशरीफ का प्रारंभिक नाम !

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पटना – बिहार के प्रमुख मजारों में शुमार मनेरशरीफ दरगाह किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है. उर्स के मेले के अलावे यहाँ पर सालों भर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है. यहाँ पर दो मजार है जिसमें मखदूम याहिया मनेरी जिसे बड़ी दरगाह के नाम से जाना जाता है और दूसरी शाह दौलत या मखदूम दौलत जिसे लोग छोटी दरगाह के नाम से जानते हैं.

जानकारों की मानें तो मनेर का प्रारंभिक नाम ‘मनियार मठान’ था जिसका अर्थ संगीतमय शहर है. मध्यकाल के दौरान सूफी संतों का ठिकाना होने के साथ संगीत की महफिल भी सजती थी. देश के विभिन्न कोने से सूफी संतों का कई दिनों का ठिकाना होने के साथ शहर को संगीतमय बनाया करते थे. मनेर मखदूम शाह दौलत का मकबरा बिहार मुगल इमारतों में सबसे सुंदर है. यह अपने समय का बिहार में सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. बिहार के मुगल सूबेदार मुहम्मद इब्राहीम खान, जो मखदूम दौलत का शिष्य था. अपने गुरु की याद में मुहम्मद इब्राहीम ने मकबरा का निर्माण कराया था.

मुस्लिम धार्मिक स्थानों में महत्वपूर्ण मनेरशरीफ की दरगाह लोगों की आस्था का केंद्र है. दरगाह की वास्तुकला और इससे जुडी धार्मिक मान्यताएं न केवल धार्मिक अनुयायियों को अपनी ओर आकर्षित करती है बल्कि देश के विभिन्न कोने से काफी संख्या में पर्यटक यहाँ आते रहते हैं. बिहार के पर्यटन मंत्री प्रमोद कुमार ने एक कार्यक्रम में कहा कि मुस्लिम समाज जितनी श्रद्धा के साथ अजमेर शरीफ दरगाह जाते हैं उतनी ही श्रद्धा के साथ मनेरशरीफ दरगाह जाते हैं. बिहार सभी धर्मों के लिए मोक्ष स्थल है.

लोगों की आस्था के कारण काफी संख्या में श्रद्धालु मजार पर चादर चढाने आते हैं. यहाँ पर लोगों की हर मुराद पूरी होती है. मान्यताओं के अनुसार मखदूम शाह कमाल उद्दीन याहिया मनेरी की दरगाह से कोई खाली हाथ वापस नहीं जाता. जानकारों की मानें तो सूफी संत मखदूम दौलत ने अपने जीवन की अंतिम सांसे 1608 में यहाँ पर ली थी. उनकी याद में इस मकबरे का निर्माण मुगल शासक मुहम्मद इब्राहीम खान ने वर्ष 1616 के आसपास करवाया था.

मखदूम शाह दौलत का मकबरा वास्तुकला का सबसे नायाब नमूना माना जा सकता है. मकबरा अंदर से 9.8 मीटर तथा बाहरी 10.6 मीटर है जो चरों ओर 3.5 मीटर से बरामदे से घिरा हुआ है. बरामदे की छत विभिन्न प्रकार के फूलों से सजाया गया है. वहीं मकबरे में सूफी संत शेख याहिया मनेरी को दुआ करते दिखाया गया है.