काफी समृद्ध है पटना यूनिवर्सिटी की सेन्ट्रल लाइब्रेरी का इतिहास !

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पटना – पटना यूनिवर्सिटी की सेन्ट्रल लाइब्रेरी का इतिहास बहुत ही समृद्ध है. यहाँ लैला-मजनूं के प्रेम पत्र की पांडुलिपि खास है. वहीं दुर्लभ पांडुलिपियां जो संस्कृत, उर्दू, पर्सियन, अरबी, मैथली, हिंदी, तिब्बती, पाली, चीनी भाषा में ताम्र पत्र, ताड़ पत्र, चर्म पत्र, लकड़ी आदि पर उकेरी गयी है. मूल पांडुलिपियां अधिक संस्कृत भाषा में है. इसमें वेद, ज्योतिष, महाकाव्य, संगीत इत्यादि शामिल है. इसके अतिरिक्त अरबी एंव फारसी भाषा में कई पांडुलिपियां मौजूद हैं. लाइब्रेरी में मुख्य रूप से 17वीं शताब्दी में लिखी गई लैला-मजनू की पांडुलिपि है. फारसी में लिखी पूरी प्रेम कहानी को समझने के लिए चित्रों का भी सहारा लिया गया है.

पटना सेंट्रल लाइब्रेरी में चार हजार पांडुलिपियों का संग्रह है. इसके साथ-साथ 14वीं शताब्दी की सरोज कालिका (संस्कृत भाषा) और मालती माधवन, काफिया शरद ए-जामी(अरबी), अजकरा 15वीं शताब्दी की तोलीनामा और रिसाला सिफत जरूरिया, 16वीं शताब्दी की जहांगीरनामा और खतमाये फरहांशे जहांगीरी तथा 17वीं सदी की मसनवी सीन खुसरो की दुर्लभ पांडुलिपियां यहाँ आकर देख सकते हैं.

बेली मेमोरियल लाइब्रेरी की नींव तब रखी गई थी, जब पीयू के निर्माण की बात चल रही थी. 1912-13 में उस समय लेफ्टीनेंट गवर्नर सर चालर्स बेली ने विवि लाइब्रेरी के निर्माण का प्रस्ताव रखा था. लेकिन 1915 में उन्होंने अवकाश प्राप्त कर लिया. इतिहास की प्रोफेसर के अनुसार 1919 में विवि लाइब्रेरी के निर्माण के लिए तीन हजार रूपये का प्रस्ताव था. 1920 तक यह राशि बढ़कर 48, 550 तक हो गई. यह लाइब्रेरी वर्तमान में पीयू के दूर शिक्षा निदेशालय में चलती थी. जमा पैसों से जो भी पुस्तकें खरीदी गयी उनका नाम रखा गया ‘बेली मेमोरियल कलेक्शन’ उसी पैसे से एक अलग स्वतंत्र भवन का निर्माण हुआ, जिसमें ये पुस्तकें रखी गयी.