लोक गाथाओं से जुड़ी है मंजूषा कला की इतिहास

2017
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पटना – भारत विविधताओं का देश है. यहाँ अनेक लोककलाएं है, जिसमें हर राज्य की कुछ अपनी पारंपरिक कलाएं हैं. इन सबमें बिहार की प्राचीन लोक कला मंजूषा कला है. मंजूषा कला भागलपुर की प्रमुख इमारतों में देखी जा सकती है. इस कला को सीखने में आज की पीढी काफी रूचि ले रही है. इसकी पहचान आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है.

मंजूषा कला के चित्रकार की मानें तो यह कला लोक गाथाओं पर आधारित है. कहते हैं कि भगवान शिव एक बार चंपानगर के तालाब में स्नान करने आये थे. तालाब कमल के फूलों से घिरा था. भगवान शिव के स्नान करने के दौरान पांच बाल टूटकर कमल के फूल पर गिर गए. जो, बाद में पांच बाल कन्याओं का स्वरुप धारण करती हैं. ये कन्याएं शिव की मानस पुत्री बनीं, जिसे मनसा माता के रूप में पहचान मिली. इन पांच कन्याओं ने भगवान शिव से संसार में अपनी पूजा की विनती की. शिव ने कहा- चंपानगर का सौदागर चंदू मेरा भक्त है अगर वो तुम्हारी पूजा करे तो फिर संसार भी तुम्हें पूजने लगेगा.

मनसा देवी के प्रयासों के बावजूद चंदू ने उनकी पूजा नहीं की. मनसा देवी में मायावी शक्तियाँ थीं. देवी ने चंदू के चारों पुत्रों को यमलोक पहुंचा दिया. इसके बाद चंदू को एक पुत्र की प्राप्ति होती है, जिसका नाम बाला होता है. उसकी शादी की पहली रात मनसा बाला को नाग से डसवा देती है और उसकी मृत्यु हो जाती है.

मृत्यु से भयभीत होने के बावजूद भी बिहुला एक नाव में मंजूषा में अपनी पति के मृत शरीर को ले नदी मार्ग से चल देती है. भगवान से अपने पति की लम्बी आयु की प्रार्थना करती है, और पति को जीवित लाने में सफल होती है. इसके बाद बिहुला अपने ससुर चंदू सौदागर को मनसा देवी की पूजा करने के लिए मना लेती है. मंजूषा पर बिहुला द्वारा सुरक्षा कवच के रूप में बनाये गये चित्र मंजूषा कला के नाम से प्रसिद्ध हुए.

दीवार से कैनवास पर उतरने के बाद मंजूषा कला का उपयोग अब कई तरह के वस्तुओं में भी होने लगा है. साडी, सूट, दुपट्टा आदि पर भी यह कला दिखने लगा है. भागलपुर में इस कला का प्रचार हो इसके लिए वहां प्रशिक्षण केंद्र खुला है. देश-विदेश में भी यह कला सम्मान पा चूकी है.