मैथली कंठ महाकाव्य के रूप में अमरगाथ ; राजा सलहेस

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पटना– मिथला पहला राज्य है जो पूर्वी भारत में स्थापित हुआ और आज बिहार का हिस्सा है. राज्य के उत्तर में स्थित है. एक समय हिमालय कि तलहटी से लेकर गंगा के दाहिने भाग तक फैला हुआ था. अब केवल अवशेष के रूप में देखने को मिलता है, जो उस समय काफी प्रसिद्ध था. यह स्थान तीर्थधाम के रूप में प्रचलित है. राजा सलहेस की राजधानी महिसौथगढ़ है, जो इस समय नेपाल की सीमा से लगभग 24 किलो मीटर पशिचम तथा भारत-नेपाल की सीमा से 18 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है. पहले कंचनगढ़ था यहा से लगभग 5 किमी पश्चिम में मानिकढह नामक सरोवर है, जिसके पास उनका सार्वजनिक सभा-मंडल था.

यहीं से लगभग 10 किमी उत्तर पश्चिम उनकी फुलवारी थी. उत्तर हिमालय पर्वत श्रृंखला, दक्षिण में गंगा नदी, पूरब में भूटान तथा पश्चिम में बगह (बाघ-गढ़) है. इस विशाल क्षेत्र में राजा सलहेस देवता के रूप में पूजे जाते हैं. सलहेस शैलेश शब्द का अपभ्रंस है और मिथिला में राजा सलहेस को पहाड़ो का राजा कहते हैं. राजा सलहेस मैथली कंठ महाकाव्य के रूप में अमरगाथ है. राजा सलहेस की प्रतिमा पीपल के पेड़ के नीचे एक मंडप में धार्मिक स्थानों पर भी स्थापित की जाती है. यहाँ के लोकगीत में भी राजा सलहेस की वीरता गायी जाती है इनके लोककथा के विभिन्न दृश्यों का भित्ति चित्रण संपूर्ण मिथला में चित्रित तरने की परम्परा है.

राजा सलहेस का राज्य बीहड़ वन में था, जिसके कारण उस समय प्राय: उपेक्षित था. आने जाने में असुविधा होती थी. इनके राज्य के लोग चोर-डाकू, लूटेरे और हिंसक वन्य जीव-जन्तुओं आदि से परेशान रहते थे. सलहेस के कथा दृश्यों के अनुसार हाथी पर सवार सलहेस तथा घोड़े पर सवार उनके महामंत्री व भाई मोतीराम को एक वीर पुरुष की तरह चित्रित किया जाता है. साथ ही कुसुमा और उनकी बहन रेशमा मालिन के विभिन्न रूपों को बड़े मनोयोग के साथ स्त्रियां निरुपित करती हैं. राजा सलहेस धार्मिक प्रवृत्ति के थे. वे शिव भक्त थे. प्रतिदिन शिव की आराधना करते थे.

राजा सलहेस छठी या सातवीं शताब्दी के थे. ऐसा मिथिला वासियों का मनना है. इनके पूर्वज यदुवंशी थे, लेकिन मिथिलावासियों के अनुसार ये दुसाध जाति के थे. सलहेस ने बचपन में ही घर छोड़ दिया था और जंगल भाग गए थे. कोल (भील) के साथ रह कर युद्ध कला का अभ्यास करते हुए जवान हुए थे. लोगों का मानना हैं कि इनके शक्ति व प्रेम के चलते जंगल के सभी जानवर इनके आसपास बैठे रहते थे. यह भी कहा जाता था कि जंगल में जब कोई जानवर से घिर जाता था, सलहेस के नाम लेने पर जंगली जानवर उनके पास से हट जाते थे. सलहेस के पूजन का एक प्रमुख कारण यह भी है. सहलेस प्रारंभ से ही शांति में विश्वास रखते थे. इसका उदाहण इसी से मिलता है कि वे जब राजा नहीं थे, उस समय वराटपुर के राजा को छल से हरा देते थे और उन्हें यह कह कर छोड़ देते हैं कि तुम समता के विचार को अपनाओ.

राजा सलहेस के साथ ठनका बाघ, बंका भालू और वनचर कुत्ते की भी मूर्ति होती है. गहबर में प्रतिदिन पूजा भी की जाती है. सिरहा मधुबनी जिले के जयनगर से लगभग 13 किलो मीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह स्थान वर्तमान में नेपाल में पड़ता है यहां हरेक साल सतुआनी जिसे मिथिलांचल में जूड़शीतल के नाम से मनाया जाता है. उस दिन बहुत बड़ा मेला लगता हैं. वैसे विद्वानों का कथन है कि यह सलहेस का जन्म स्थान है. वहां पर एक पिंड बना है और सलहेस के परिवार की मूर्ति बनी है. सलहेस के मरने के बाद उनके शरीर का अंतिम संस्कार इसी गहबर के पास किया गया था. इस वजह से इसका नाम सिराह रखा गया.