आस्था का पर्याय, माँ मुंडेश्वरी धाम!

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बिहार के कैमूर जिला मुख्यालय भभुआ से लगभग 15 किलोमीटर दूर कैमूर की पहाड़ियों पर स्थित माँ मुंडेश्वरी एवं महामंडलेश्वर महादेव का मंदिर है. यह मंदिर लगभग साढ़े सौ फीट की ऊंचाई पर है. इस मंदिर को देश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है. किन्तु कितना प्राचीन है इसका कोई प्रमाण नहीं है. हाँ, इतना प्रमाण अवश्य मिलता है कि मंदिर में अनाज का प्रबंध एक स्थानीय राजा द्वारा संवत्सर के तीसवें वर्ष के कार्तिक मास के 22वें दिन किया जाता था. इसका उल्लेख एक शिलालेख में उत्कीर्ण राजाज्ञा में किया गया है. इसका मतलब कि शिलालेख के पूर्व भी यह मंदिर था.

वर्तमान में पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भग्नावशेष के रूप में है. ऐसा लगता है कि मंदिर को तोड़ा गया है. मूर्तियों के अंग ऐसे हैं जैसे इन पर तेज हथियारों प्रहार किया गया हो. पंचमुखी महादेव का मंदिर भी टूटी अवस्था में है, एक भाग में माता की प्रतिमा को दक्षिणमुखी स्वरुप खड़ा कर पूजा-अर्चना की जाती है.

काले पत्थर की प्रतिमा

माँ मुंडेश्वरी की प्रतिमा साढ़े तीन फीट की है. यह काले पत्थर की है. प्रतिमा में माँ भैंस पर सवार हैं. इस मंदिर का उल्लेख कनिंघ्म ने अपनी पुस्तक में भी किया है. इस मंदिर का पता तब लगा जब कुछ गड़ेरिये पहाड़ी पर गए और मंदिर को देखा. तब इस मंदिर की इतनी ख्याति नहीं थी. प्रारंभ में पहाड़ी के नीचे रहने वाले ही इस मंदिर में पूजा करने जाते थे. वर्तमान में धार्मिक न्यास बोर्ड बिहार सरकार द्वारा इस मंदिर को व्यवस्थित किया गया. माघ पंचमी से पूर्णिमा तक इस पहाड़ी पर मेला लगता है. जिसमें दूर-दूर से लोग आते हैं.

मंदिर से जुड़ी कहानी

कहते हैं कि चंड-मुंड नामक राक्षस के नाश के लिए जब देवी उद्यत हुई थीं तो चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इस पहाड़ी में छिप गया था. यहीं पर माता ने उसका वध किया था. इसलिए यह मंदिर माँ मुंडेश्वर के नाम से जाना जाता है. आश्चर्य या श्रद्धा जो कहिये, यहाँ भक्तों की कामना के पूरा होने के बाद बकरे की बलि चढ़ाई जाती है. पर माता रक्त की बलि नहीं लेतीं. बल्कि बलि चढाने के समय जब बकरे को माँ की मूर्ति के सामने लाया जाता है तब पुजारी अक्षत को मूर्ति से स्पर्श करा कर बकरे पर फेंकता है और बकरा तत्क्षण अचेत मृतप्राय हो जाता है. थोड़ी देर बाद अक्षत फेंकने की प्रतिक्रिया फिर होती है तो बकरा उठ खड़ा हो जाता है. बलि की यह क्रिया माँ के प्रति आस्था को बढाती है.

पत्थरों पर लिखे हैं मंत्र

पहाड़ी पर बिखरे पत्थरों एवं स्तम्भ पर श्रीयंत्र सरीखे कई सिद्ध यंत्र एवं मंत्र लिखे हुए हैं. मंदिर के प्रत्येक कोनों पर शिव लिंग है. ऐसा लगता है कि पहाड़ी के पूर्वी-उत्तर क्षेत्र में माता मुंडेश्वरी का मंदिर स्थापित रहा होगा. उसके चरों तरफ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित रही होगी. मंदिर के रास्ते में पत्थरों पर तमिल और सिंहली भाषा में भी कुछ लिखा हुआ है.

बिहार सरकार की पहल

मंदिर की प्राचीनता एवं माता के प्रति बढती आस्था को देखते हुए राज्य सरकार ने भक्तों की सुविधा के लिए यहाँ पर विश्रामालय, रज्जुमार्ग आदि का निर्माण कराया है. भभुआ से माँ मुंडेश्वरी के धाम तक जाने के लिए राज्य सरकार ने सड़क भी बनवा दिया है. यहाँ राज्य सरकार का एक गेस्टहाउस भी है. पहाड़ पर स्थित मंदिर तक अब छोटे वाहन भी जा सकते हैं. मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियों का भी लोग प्रयोग करते हैं.