पतेसर शरीफ में पूरी होती हर दुआ

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बिहार हमेशा से ही सूफी-संतों की कर्म और साधना स्थल रहा है. यहाँ सूफी-संतों ने मानव मन को वैचारिक पवित्रता प्रदान करने के लिए आध्यात्मिकता की अविरल धारा प्रवाहित की है. कैमूर की पावन धरती को सूफी-संतों ने चिंतन, मनन और आस्था को केंद्र एवं अपनी कर्मस्थली बनाया. हजरत बाबा खलील शाह चिश्ती साबिरी जैसे महान सूफी-संत ने भभुआ में अपने उपदेशों से दुनिया भर के लोगों के दिलों में इंसानियत, मोहब्बत, दयालुता और विनम्रता से समाज की सेवा करने का जज्बा जगाया. बाबा की करामत बेशुमार है. सच तो यह है कि बाबा खलील शाह की पूरी जिंदगी ही अपने आप में करामत है.

विख्यात हजरत खलील शाह चिश्ती साबिरी के प्रति श्रद्धा और अकीदत रखने वालों की संख्या काफी है. इनमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख सहित अन्य धर्मों के लोग शामिल हैं. सूबे ही नहीं वरन अन्य प्रदेशों से भी श्रद्धालु यहाँ आते हैं. लोगों का विश्वास है कि यदि यहाँ सच्चे दिल से माँगा जाए तो उनकी मुराद अवश्य पूरी होती है. बाबा खलील शाह का जन्म 1910 ईसवी में ग्राम गुरेरा (चंदौली, यूपी) में हुआ था. वालिद को जब बच्चे को गोद में दिया गया तो अचानक बोल पड़े यह हमारा बच्चा फकीर होगा.

बाबा खलील शाह जब आठ साल की उम्र में पहुँचे तो उनके चचेरे नाना ने गोद लिया क्योंकि नाना साहब को कोई औलाद न थी. बाबा की प्रारंभिक शिक्षा नाना के यहाँ वाराणसी में हुई. जब वे 10 साल के थे तो उनके नाना-नानी ने उस समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित रामदेव को बुलाया और उनसे पूछा कि पंडित जी इस बच्चे से हमलोगों का वंश आगे चलेगा या नहीं? पंडित रामदेव ने कहा, यह तो फ़क़ीर होगा और ताउम्र जंगलों में ही गुजरेगी. यह बात सुनकर नाना-नानी काफी निराश हुए, मगर उन्हें क्या मालूम था कि जिस बालक को उन्होंने गोद लिया है वह कोई साधारण बालक नहीं है. वे सिलसिला चिश्तिया साबिरी के साहेबे करामत वली है.

जब वे 15 साल के हुए तो अचानक छह-छह माह के अंतराल में नाना-नानी का इंतकाल हो गया. इसके बाद बाबा सभी जमीन-जायदाद छोड़ कर फ़ौज में भर्ती हो गए. तीन साल तक लाहौर में रहने के बाद उन्होंने फ़ौज की नौकरी छोड़ दी और मालिक-ए-हकीकी की जुस्तुजू में जंगल की राह ले ली. बाबा खलील शाह ने सफरे फकीरी का आगाज हजरत लतीफ़ शाह बर्री के आस्ताने पर हाजिरी से किया. उन्होंने एक रात वहां क्याम फ़रमाया (ठहरे). लतीफ़ शाह से चल कर वे अपने खाला के घर में क्याम फ़रमाया. वहां से वे अम्बिका शरीफ आए और अंबिकापुर के राजा के दरबार में तीन माह तक मुंशी की नौकरी की. वहां से वे नौकरी छोड़ी और पांच साल तक जंगल ही जंगल घूमते रहे.

इस महान फ़कीर के साथ सफर के सामान के नाम पर केवल ढाई गज की दो लुंगियां, एक टोपी और जाफरान-केसर से लिखी एक कुरआनशरीफ के आलावे साथ में कुछ भी न था. उन्होंने खुदा की इबादत में सारी दुनिया के ऐशो आराम छोड़कर जंगल की खाक छानने और पेड़ की पत्तियां और जंगली फलों को खाकर जिंदगी गुजारी. बाबा ने हेयुंती बनौरा को खैरबाद कहा और मुगलसराय, अलीगढ़ तथा दिल्ली होते हुए बाबा गरीब नवाज की बारगाह में हाजिरी दी. रूहानी फैज हासिल करने के बाद उन्होंने गुजरात का सफर किया. फिर गुजरात से वापसी पर अपने गरीब नवाज की बारगाह में हाजिरी दी.

मुगलसराय के पास ही सहजौर नामक बस्ती के बाहर नदी के किनारे लोगों के अनुरोध पर एक कुटिया बनाई. इसके कुछ दिनों बाद वे फिर अजमेरशरीफ तशरीफ़ ले गये और इसके बाद वे पतेसरशरीफ (कैमूर) तशरीफ़ लाये. आखिरी आरामदाह के लिए उन्होंने पतेसरशरीफ को ही चुना. जहाँ आज भी उनका आस्ताना दुखियों की पनाहगाह बना हुआ है. प्रतिवर्ष 23 रमजान को छोटी उर्स और 13 अप्रैल को एक दिवसीय बड़ी उर्स बाबा के उस्ताद के सम्मान में मनाया जाता है.