हसन इमाम साहब ने बूढ़े दुकानदार के पैरों पर क्यों अपनी टोपी उतारकर रख दी ?

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पटना – शायद ही कोई बिहारवासी होगा, जिसने अली इमाम साहब का नाम नहीं सुना होगा. इनका नाम बड़ी श्रद्धा से याद किए जाते हैं. ये बिहार के निर्माताओं में से थे. अली इमाम के छोटे भाई, हसन इमाम साहब, उन गिने-चुने मुसलमानों में से थे जिनके दिल में अपने मुल्क के लिए गहरी मुहब्बत थी. वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से प्रभावित थे.

उन दिनों मुसलमान अंग्रेजी राज के हिमायती माने जाते थे. वे अभी कांग्रेस के प्रति आकृष्ट नहीं हुए थे. कांग्रेस का पहला जलसा 1885 में बम्बई में हुआ था. कांग्रेस की बढ़ती हुई ताकत को कम करने के लिए वाईसराय लार्ड मिन्टो की मदद से मुस्लिम लीग की स्थापना हुई. इसकी पहली बैठक ढाका में 1906 में हुई, जो आज बांग्लादेश की राजधानी है. इसमें बिहार के जिन दो प्रमुख नेताओं ने भाग लिया था वे थे – सारण के मौलाना मजहरुल हक और पटना के हसन इमाम. लेकिन उन्होंने लीग का सदस्य बनने से इंकार कर दिया और आजीवन राष्ट्रवादी बने रहे. हसन इमाम आगे चलकर कांग्रेस के अध्यक्ष भी हुए और मौलाना मजहरुल हक़ ने सदाकत आश्रम की स्थापना की.

हसन इमाम के राष्ट्रवादी बने रहने का यह आलम था कि उनकी ड्योढ़ी पर बराबर राष्ट्रवादियों की बैठकें होती रहती थीं. इनके बड़े भाई अली इमाम वाइसराय की काउंसिल के सदस्य थे. एक दिन बड़ी ही दिलचस्प घटना घटी. और दिनों की तरह हसन इमाम अपनी बैठक में कांग्रेसियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे. देश के बड़े-बड़े नेता बैठे थे. इतने में अली इमाम की बड़ी सि विदेशी गाड़ी आकर रुकी. उन्होंने देखा छोटे भाईजान की कांग्रेस लगी हुई है. वह कमरे में दाखिल होते हुए बोले,” तुम काले लोग किस साजिश में लगे हो?” यह सुनकर सभी लोग स्तब्ध रह गये और उनके चेहरों का रंग फीका पड़ने लगा. लेकिन हसन इमाम साहब की हाजिर जवाबी ने गंभीर माहौल को हल्का कर दिया. उन्होंने कहा,” हम काले लोग आप जैसे काले लोगों की आँखों पर पड़े परदे को हटाने का उपाय सोच रहे हैं.” हसन साहब की हाजिर जवाबी से अली इमाम साहब भी अपनी मुस्कुराहट नहीं रोक सके.

हसन साहब प्रगतिशील विचारों के हिमायती थे. उस समय परदा-प्रथा का चलन था, जिसका पालन बहुत कठोरता से किया जाता था. बेटी महमूदा इमाम को पढ़ाया-लिखाया. परदा-प्रथा को हटाने और आधुनिक शिक्षा को फ़ैलाने की उन्होंने बहुत कोशिश की.खुद ऊँचे घराने के थे, इसलिए उनके साथ बिहार और उत्तर प्रदेश के ऊँचे खानदान की स्त्रियाँ परदे के घेरे से बाहर निकलीं. भारतीय नारी-समाज, खासतौर पर मुस्लिम नारी-समाज को उन्होंने आगे बढ़ाया.

हसन इमाम साहब का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा. 1914-18 के प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान कांग्रेस ने अंग्रेजों का साथ दिया था. बदले में अंग्रेजों ने वायदा किया था कि वे लड़ाई के बाद भारत में ऐसी सरकार का गठन करेंगे, जो भारतीय जनता के प्रति उत्तरदायी होगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 1918 की गर्मियों में शासन सुधार के लिए मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित हुई. इसे पढ़कर लोगों को घोर निराशा हुई. हसन इमाम भला कब चुप बैठने वाले थे. उन्होंने एलान किया, “यह सुधार अपूर्ण, असंतोषप्रद और निराशजनक है.”

1919 में अंग्रेजों ने एक नृशंस कानून, रौलेट एक्ट लागू कर दिया. इस कानून से सरकार जिसको चाहती बिना अदालत में पेश किए नजरबंद कर सकती थी. इसके विरोध में सभाएं होने लगी. अप्रैल का महीना भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में जाना जाएगा. उस दिन गांधीजी ने सत्याग्रह का श्रीगणेश सामान्य काम बंद करने से शुरू किया. लोगों को सारे दिन उपवास करना था, उस दिन की हड़ताल बेजोड़ थी.

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार, उस दिन की हड़ताल इतनी जबरदस्त हुई कि शायद ही कभी पहले वैसी हड़ताल देखी गई हो. पटना के दुकानदारों से हड़ताल के लिए अनुरोध किया जा रहा था. लेकिन कुछ दुकानवाले राजी नहीं हो रहे थे. यह खबर हसन इमाम साहब तक पहुँची. हसन साहब डॉ.राजेन्द्र प्रसाद के साथ एक दुकान तक गए. वहां पहुंचते ही हसन साहब ने बूढ़े दुकानदार के पैरों पर अपनी टोपी उतारकर रख दी. यह देखकर दुकानदार अवाक् रह गये. कहने लगे,”आपने यह क्या किया, आपका हुक्म ही हमारे लिए काफी होता.” जुलूस इतना लम्बा निकला कि गुलज़ार बाग़ से लेकर सभा-स्थल, शहर के किले तक आदमी ही दिखाई देते थे.

इस तरह सैयद इमाम साहब ने राष्ट्रीय कल्याण को सर्वोपरि समझा. गांधीजी के आदेशों का उन्होंने अक्षरशः पालन किया. सभा-स्थल को तीर्थ-स्थान के समान पाक समझा. उन्होंने जिस पवित्र भावना से आजादी की लड़ाई में भाग लिया, वह हम सबके लिए प्रेरणादायक है.