घुड़सवारों का मुकाबला लाठी से

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सीवान जिले में आंदर एक थाना है. आंदर थाने में ही जीरादेई गाँव है, जो गणतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जन्मभूमि है. इसी गाँव से दो मील की दूरी पर बड़हुलिया गाँव है. यह वही भाग्यशाली गाँव है, जिसने नमक सत्याग्रह और चौकीदारी टैक्स विरोधी सत्याग्रह के शहीद गंगा प्रसाद राय को जन्म दिया था.

नमक सत्याग्रह के साथ-साथ उन दिनों चौकीदारी टैक्स न देने का भी आन्दोलन चल रहा था. गाँवों में चौकीदार होते थे. हर गाँव के बारे में सूचना देने के लिए सरकारी तंत्र के वे ही प्रथम कर्मचारी थे. चौकीदार पुलिस विभाग का कर्मचारी होता था. वह गाँव में घटित घटनाओं, जन्म-मरण, मारपीट, दंगा-फसाद, बाहरी लोगों के आने-जाने, विवाह आदि की बारे में सूचना दिया करता था. प्रत्येक गाँव का प्रत्येक परिवार चौकीदारी टैक्स देता था. कई गाँवों को मिलाकर एक सर्कल होता और हर सर्कल के लिए एक पंच नियुक्त होता था. इसी पंच को सर्कल मेम्बर पंच कहते थे. उसे ही चौकीदारी टैक्स वसूल करने का अधिकार प्राप्त था.

सर्कल मेम्बर पंच को बीट का प्रेसिडेंट भी कहते थे. जब बड़हुलिया गाँव की लोगों ने चौकीदारी टैक्स का विरोध करना शुरू किया, तो इसकी सूचना बीट प्रेसिडेंट गोगा लाल ने सीवान के अनुमंडल पदाधिकारी को दे दी. इसी प्रकार की सूचना दारौली थाने से भी दी गई थी. यह सरकारी सत्ता को चुनौती थी. इसलिए सरकार ने इस विरोध को सख्ती से दबाना जरूरी समझा. 28 दिसम्बर 1930 की बात है. गोरी पलटन के घुड़सवार बड़हुलिया जा पहुँचे. बिना किसी पूछताछ के उन घुड़सवारों ने लोगों की अँधाधुंध पिटाई शुरू कर दी. इससे पूरे गाँव में खलबली मच गई.

उस समय बहुत से लोग खेतों में काम कर रहे थे. गंगा प्रसाद राय अपने सहोदर भाई शिव प्रसाद राय के साथ खेत में ढेकी से पानी पटा रहे थे. दोनों भाई तुरंत खेत पटाना छोड़कर गाँव में पहुँच गए और अपनी लाठी लेकर घुड़सवारों से भिड़ं गए. गाँव के अन्य युवकों ने भी उनका साथ दिया. घुड़सवारों को ऐसे साहस की उम्मीद नहीं थी. वे हक्के-बक्के रह गये. कुछ लोगों को चोटें भी आयीं. गंगा प्रसाद राय को गोली लगी और वह धराशायी हो गये. उनके शव को गोरे सैनिकों ने अपने कब्जे में कर अन्त्य परीक्षा के लिए गोपाल गंज भेज दिया. गाँव के अन्य निवासी जैसे प्रभुलाल दुबे, सूरज राय, अक्षयवट गोड और सुखराम गोड भी घायल हुए.

गंगा प्रसाद राय कसा जन्म 1874 में हुआ था. उनके पिता का नाम राम भरोसा राय था. गंगा प्रसाद राय बिलकुल अनपढ़ थे. लेकिन उनमें समझदारी और निर्भयता कूट-कूटकर भरी हुई थी. इस प्रकार इतिहास गवाह है कि ठेठ देहात के अनेक अनपढ़ लोगों में भी देश की स्वाधीनता के प्रति जाग्रति 1930 से पहले ही आ गई थी और गंगा प्रसाद राय जैसे अनपढ़ किसानों ने अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम में अपने-अपने ढंग से नेतृत्व किया था.