सारण जिले में मार्शल लॉ

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सारण जिला शुरू से ही स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहा है. फिर 1942 की क्रान्ति में कैसे पीछे रहता? अगस्त से ही क्रान्ति का दौर शुरू हो गया था. स्कूल और कॉलेज के लड़कों ने पढ़ाई छोड़ दी. उस समय छपरा में एक ही कॉलेज था – राजेन्द्र कॉलेज. उसके छात्रों ने क्रान्ति को नेतृत्व प्रदान किया. छात्र नेताओं में शंकर नाथ विद्यार्थी प्रमुख थे. वह सीवान अनुमंडल के सीवान – सिसवन सड़क पर बसे सहूलि ग्राम के निवासी थे.

9 अगस्त को छात्रों का एक विशाल जुलूस छपरा जिला कचहरी पर जा पहुँचा. साहब गंज बाजार और म्युनिसिपैलिटी चौक, सब जगह लोग भरे पड़े थे. सब-डिवीजन कोर्ट के पश्चिम में, कुएं के पास चर्च की चारदीवारी के पूर्व में सशस्त्र पुलिस अंग्रेज सार्जेंट मेजर के नेतृत्व में खड़ी थी. कलेक्टर के.पी.सिन्हा निकर, आधी बांह की कमीज, काला चश्मा और टोप पहने चुरुट का कश लेते हुए शांत किन्तु गंभीर मुद्रा में खड़े थे.

दिन के 11 बजे का समय होगा. युवकों का जुलूस बढ़ता हुआ कलेक्ट्री में प्रवेश कर चुका था. एक छात्र दनदनाता हुआ, लोहे की सीढियाँ चढ़ता हुआ, छत पर पहुँच गया और तिरंगा झंडा फहराकर लौट आया. तालियों की गडगडाहट के बीच झंडा-गान गाया गया. कचहरी में काम बंद हो गया. डिस्ट्रिक्ट बोर्ड कार्यालय और म्युनिसिपैलिटी के कार्यालय पर भी तिरंगा फहराया गया. पुलिस की टुकड़ी कभी फौजदारी तो कभी दीवानी कचहरी में जाती रही. खजाने के पास भारी भीड़ एकत्र थी. लेकिन वहां पर भी कड़ा पहरा लगा हुआ था.

दूसरे दिन शम्भू नामक छात्र ने सब-डिवीजन कचहरी पर पीछे से आकर तिरंगा झंडा फहरा दिया. शम्भू झंडा फहराकर ऊपर से कूद पड़ा और नीचे खड़े लोगों ने उसे हाथों पर संभाल लिया. सरकार ने जिला कांग्रेस ऑफिस पर पहरा बैठा रखा था. भीड़ वहां जा पहुंची. लोगों ने सिपाही को वहां देखकर नारे लगाये ” सिपाही हमारा भाई है.” सिपाही ने भी उत्तर दिया, ” हम आपके भाई हैं, लेकिन हमारी भी ड्यूटी है. आप तोड़-फोड़ न करें, मुझे अपने ऊँचे हाकिम को सूचित करने का मौक़ा दे दें.”

सारण जिले भर में क्रांति की लहर बहुत तेजी से फ़ैल गयी. सीवान, भैरवा, महाराज गंज, दिघवारा, सोनपुर, गरखा आदि स्थानों पर अंग्रेजी राज प्राय: ठप्प हो गया. अत: तोपों से लैस अंग्रेजी फौज की एक बड़ी टुकड़ी छपरा पहुँच गयी. फौज की उस टुकड़ी ने छपरा जिला स्कूल के पूर्व में हथुआ मैनेजरी के मैदान ( आज का इंस्पेक्शन बंगला ) में अपना डेरा डाला. टैंक सड़कों पर घुमने लगे. पुलिस लाइन्स में फौज जमा हो गई. सारे जिले में एलान हो गया कि जो भी रेल की पटरी उखाड़ता हुआ, तार काटता हुआ, सड़क काटता हुआ, या सरकारी विभागों के कार्य में बाधा डालता हुआ देखा जाएगा, उसे देखते ही गोली मार दी जाएगी. सड़कों पर लोगों का गिरोह में आना-जाना बंद हो गया. सरकारी कर्मचारी भी जब छपरा से गाँव जाते, तो साथ में उन्हें भी पहचान-पत्र और अनुमति-पत्र रखना पड़ता था.