नीतीश क्या मोल तोल में लगे हैं?

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उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का इस्तीफा हुआ तो महागठबंधन बरकरार रहेगा। अगर बर्खास्त हुए तो बीजेपी के साथ जदयू का जाना तय। कांग्रेस के सामने नीतीश ने दो शर्तें रख दी हैं। तेजस्वी को इस्तीफा देने के लिए लालू यादव को तैयार कर लें। दूसरी शर्त 2019 में उनकी और उनके पार्टी की क्या भूमिका होगी ये भी बता दें। साथ ही कांग्रेस से नीतीश की शिकायतों की लंबी फेहरिश्त है। महागठबंधन के बनने और बिहार में हुई जीत के बाद नीतीश ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पार्टी को ले जाने की बात कही थी। इसके लिए जितने राज्यो में चुनाव हुए सभी जगह महागठबंधन की तर्ज़ पर काम करने की अपील की पर हर जगह नकार दिए गए। असम में असम गण परिषद और बदरुद्दीन की पार्टी से बात कर ली पर अंतिम समय में कांग्रेस पीछे हट गई। यूपी में तो महागठबंधन की बात छोड़ दें नीतीश से किसी ने बात तक नहीं की। जबकि उनकी पार्टी कुछ विधान सभा में चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी थी। दिल्ली म्युनिसिपल के चुनाव में भी बात नहीं बनी। राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश की किसी ने नहीं सुनी तो नीतीश ने भी अलग राह पकड़ कर सबको झटका दे दिया। अब बात तेजस्वी के इस्तीफे पर अटकी हुई है। नीतीश ने कांग्रेस को साफ कर दिया है कि उनकी मंशा साफ है। वो किसी दागी को अपने साथ नहीं रखेंगे।

ऐसे में बीजेपी भी नीतीश के प्रति नरम रुख अपना कर कांग्रेस को डरा रही है। पर सवाल उठता है कि क्या नीतीश और नरेंद्र मोदी की दोस्ती होगी ? अगर कांग्रेस ने नीतीश की बात नहीं मानी तो नीतीश महागठबंधन की नाव छोड़कर एनडीए की जहाज़ पकड़ लें तो कोई अचरज नहीं होगा। भ्र्ष्टाचार मोदी का भी एजेंडा है ओर नीतीश भी इसी के पक्षधर हैं।