मरता सिर्फ शहीद नहीं

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मरता देश का गुरुर है, स्वाभिमान है, उसका परिवार है
गया। ना रौशनी, ना रास्ते और ना ही स्कूल, पर देशभक्ति का जुनून ऐसा की सेना में भर्ती हो गए। देश को आज़ाद हुए 70 साल होने को है पर बोकनारी की तस्वीर नही बदली। गाँव से 5 किलोमोटर पहले से ही सड़क़ नहीं है। गाँव की दुर्दशा ऐसी कि जो एक बार गाँव पहुँच जाए तो दोबारा जाने से काँप जाए। बड़ी गाड़ियों को छोड़ मोटरसाइकिल पर से नीचे उतर कर जाना पड़ता है। गया से 25 किलोमीटर दूर परैया प्रखंड के बोकनारी गाँव के जांबांज़ एस के विधार्थी के शहीद होने पर पिता मथुरा यादव को बेटे के खोने का गम है पर नाज़ है।

देशभक्त सैनिक बेटे एस के विधार्थी के पिता मथुरा यादव को दशहरा की छुट्टी में अपने बेटे के आने का इंतज़ार था। इतना कहते ही मथुरा यादव टूट जाते हैं। आवाज़ भारी हो जाती है। आँख से आंसू बहने लगता है। फिर हिम्मत समेट कर बताते हैं कि आखिरी बार बेटे ने कहा था कि कितनी परेशानी और कठिन जगह पर रहता है। बर्फ की चादर में सोता है और बर्फ पर ही भारी ठंड में दुश्मन से लड़ने के लिए रहता है । माँ और पत्नी बेसुध हैं। जो कोई पास आता है सबसे एक ही सवाल। अब क्या होगा। विकास से कोसों दूर बोकनारी गाँव से 1998 में एस के विधार्थी सेना में भर्ती हुए थे । गाँव से काफी लगाव था। तीन बेटियों को पढ़ाने के लिए गया शहर में किराए पर मकान ले रखा था ।पिता की मौत की खबर सुन बच्चे स्कूल बीच में ही छोड़ गाँव जाने लगे। पर उन्हें रास्ते में ही गाड़ी छोड़कर पैदल आना पड़ा। क्योंकि कोई साधन नही था। बड़ी बेटी आरती क्लास 8 में पढ़ती है और थोड़ी समझदार भी पर छोटी बहनों को तो पता ही नहीं है कि उनके घर पर कितनी बड़ी विपत्ति आई है।

हौसला पिता की ही तरह है आरती का। अपने मामा के साथ गाँव आई और माँ को सांत्वना देने लगी। अपने आंख के आंसू को थामे माँ और दादी को चुप कराने के लिए गले से लिपट जाती है। वाकई बहुत बहादुर है आरती। भाई महज़ दो साल का है उसे कुछ नहीं पता। छोटी बहने माँ को बिलखता देख वो भी रोने लगी। बहनों को लग रहा है कि किसी ने उनके पिता को उन सबसे छीन लिया है। पर वो करे तो क्या करें? हिम्मत बाँध कर कहती हैं कि गया में उसका परिवार रेंट पर रहता है और सभी पढ़ाई कर रहे हैं इसलिए रहने के लिए एक घर और पढाई लिखाई ना रुके इसका इंतज़ाम हो जाए। इधर पिता जब लोगों से बात कर रहे थे तभी बीजेपी नेता सुशील मोदी का फोन आ जाता है। अपने बेटे की बात करते-करते कई बार फफक-फफक कर रो पड़ते हैं फ़ोन पर ही। घर के आँगन में चारो तरफ रोने , चिंघार मार कर गिरने तो सिसकने की आवाज़ है। बूढी माँ को सांत्वना देने आई रिश्तेदार भी ज़ार-ज़ार हो रही हैं। 7 साल की बच्ची का भी रो-रो कर बुरा हाल है। पत्नी किरण की आवाज़ बैठ गइ है। उसे समझ में नही आ रहा की खुद को संभाले या बच्चों को या फिर बूढ़े सास-ससुर को। शहीद एस के विद्यार्थी अपने घर को ठीक नहीं बना सका। सिर्फ ईंट पर ईंट थे, ना प्लास्टर ना किवाड़। खिड़की में पल्ले भी नही। टूटे मकान के बनने की एक आस थी क्योंकि शहीद बेटा ही कमाने वाला था। दो भाई बेरोज़गार घर पर ही रहते हैं और शहीद विद्यार्थी का परिवार भी अनाथ हो चुका है।