जीवित व्यक्ति को सरकारी बाबू ने घोषित किया मृत, 10 साल से सरकारी दफ्तर की चक्कर काट रहा पीड़ित, नहीं हो रही सुनवाई

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BETIAH: केंद्र और राज्य दोनों सरकार ने वृद्धों का ख्याल रखते हुए कई योजनाएं बनाई है. वहीं वे योजनाओं के धरातल पर होने का दावा भी करते हैं. लेकिन धरातल पर तो स्तिथी कुछ और ही है. वृद्धों को योजनाओं का लाभ देना तो दूर सरकारी बाबू तो उनके जीवित होने का भी प्रमाण मिटा दे रहे हैं.

ताजा मामला बिहार के बेतिया के नरकटियागंज के मलदहिया पोखरिया पंचायत से प्रकाश में आया है, जहां 65 वर्षीय जीवित वृद्ध आशिक बैठा को व्यवस्था ने मृत घोषित कर दिया है. आशिक बैठा को 2010 में ही सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया था. वहीं कबीर अंत्योष्टि अनुदान योजना से 1500 रुपया की अनुदान राशि भी उठा ली गई है. जिसके बाद इस व्यक्ति को 2010 से किसी भी सरकारी योजना का लाभ नही मिल रहा है, क्योंकि सरकार की नजरों में तो वह मर चुका है.

इस मामले को लेकर वह पिछले 10 से सरकारी दफ्तरों की चक्कर काट रहा है, केवल यह यह बताने के लिए की मैं जिंदा हूं. मिली जानकारी के अनुसार पीड़ित आशिक बैठा ने 2014 में बेतिया डीएम को एफेडेविट देकर यह गुहार लगाया कि साहब मैं जिंदा हूँ, तत्कालीन डीएम ने नरकटियागंज के बीडीओ को जांच करने का आदेश दिया लेकिन आज तक जांच में यह साबित नहीं हो पाया है कि आशिक बैठा जिंदा है.

इस संबंध में आशिक बैठा और उनके भाई यूनुस बैठा बताते है कि जिंदा होने का सबूत भी देने पर आज तक प्रशासन और सरकारी अफसरों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई है. इधर मृत घोषित होने के बाद से उनको सरकारी योजनाओं से अलग कर दिया गया है. वहीं इस बाबत जब बीडीओ राघवेंद्र त्रिपाठी से पूछा गया तो उन्होंने बताया मामला संज्ञान में नहीं था. अब पूरे मामले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी.

इन सब के बीच अब सवाल यह उठता है कि यह कैसा सिस्टम है जो जीवित व्यक्ति को मृत घोषित कर देता है. यह तक कि बिना जांच पड़ताल के उसके कफन की राशि भी पास लर देता है. सबसे बड़ी बात कि पीड़ित द्वारा बार बार अपने जिंदा होने के प्रमाण देने के बावजूद भी अधिकारी इसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है.